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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (26)

त्वं बलस्य गोमतोSपावरद्रिवो बिलम् |

त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ||5||

ऋग्वेद 1|11|5||

पदार्थ -

अद्रिवः................जिसमें मेघ विद्यमान है ऐसा जो सूर्य्यलोक है, वह
गोमतः................ जिसमें अपने किरण विद्यमान है उस
अबिभ्युषः............भयरहित
बलस्य...............मेघ के
बिलम्................जलसमूह को
अपावः................अलग कर देता है,
त्वाम्.................इस सूर्य्य को
तुज्यमानासः..........अपनी अपनी कक्षाओं में भ्रमण करते हुए
देवाः...................पृथिवी आदि लोक
आविषुः................विशेष करके प्राप्त होते हैं

भाषार्थ -

जैसे सूर्य्यलोक अपनी किरणों से मेघ के कठिन बद्दलों को छिन्न भिन्न करके भूमि पर गिराता हुआ जल की वर्षा करता है, क्योंकि यह मेघ उसकी किरणों में ही स्थिर रहता, तथा इसके चारों ओर आकर्षण अर्थात् खींचने के गुणों से पृथिवी आदि लोक अपनी अपनी कक्षा में उत्तम उत्तम नियम से घूमते हैं, इसी से समय के विभाग जो उत्तरायण, दक्षिणायन तथा ऋतु, मास, पक्ष, दिन, घड़ी, पल आदि हो जाते हैं, वैसे ही गुणवाला सेनापति होना उचित है ||5||

तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन्|
उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ||6||
ऋग्वेद 1|11|6||

पदार्थ -

शूर........................हे, धार्मिक घोर युद्ध से दुष्टों की निवृत्ति करने तथा विद्या बल पराक्रमवाले वीर पुरुष ! जो
तव........................आपके निर्भयता आदि दानों से मैं
सिन्धुम्....................समुद्र के समान गम्भीर वा सुख देनेवाले आपको
आवदऩ्....................निरन्तर कहता हुआ
प्रत्यायम्..................प्रतीत करके प्राप्त होऊं | हे
गिर्वणः.....................मनुष्यों की स्तुतियों से सेवन करने योग्य ! जो
ते..........................आपके
तस्य......................युद्ध राज्य वा शिल्प-विद्या के सहायक
कारवः.....................कारीगर हैं, वे भी आपको शूरवीर
विदुः.......................जानते तथा
उपातिष्ठन्त................समीपस्थ होकर उत्तम काम करते हैं, वे सब दिन सुखी रहते हैं ||6||

भावार्थ -

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार हैं | ईश्‍वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि - जैसे मनुष्यों को धार्मिक प्रशंसनीय सभाध्यक्ष वा सेनापति मनुष्यों के अभयदान से निर्भयता को प्राप्त होकर जैसे समुद्र के गुणों को जानते हैं, वैसे ही उक्त पुरुष के आश्रय से अच्छी प्रकार जानकर उनको प्रसिद्ध करना चाहिए तथा दुखों के निवारण से सब सुखों के लिये परस्पर विचार भी करना चाहिये ||6||

मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः |
विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ||7||
ऋग्वेद 1|11|7||

पदार्थ -

हे परमैश्‍वर्य को प्राप्त कराने तथा शत्रुओं की निवृत्ति करानेवाले शूरवीर मनुष्य !
त्वम्.............तू उत्तम बुद्धि सेना तथा शरीर के बल से युक्त हो के
मायाभिः..........विशेश‌ बुद्धि के व्यवहारों से
शुष्णम्...........जो धर्मात्मा सज्जनों का चित्त व्याकुल करने
मायिनम्.........दुर्बुद्धि दुःख देनेवाला सब का शत्रु मनुष्य है, उसका
अवातिर..........पराजय किया कर,
तस्य.............उसके मारने में
मेधिराः...........जो शास्त्रों को जानने तथा दुष्टों को मारने में अति प्रवीण मनुष्य हैं, वे
ते.................तेरे सङ्गम से सुखी और अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हों,
तेषाम्............उन धर्मात्मा पुरुषों के सहाय से शत्रुओं के बलों को
उत्तिर.............अच्छी प्रकार निवारण कर ||7||

बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्‍वर आज्ञा देता है कि - साम, दाम, दण्ड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों की निवृत्ति करके विद्या और चक्रवर्ति राज्य की यथावत् उन्नति करनी चाहिये तथा जैसे इस संसार में कपटी, छली और दुष्‍ट पुरुष वृद्धि को न प्राप्त हों, वैसा उपाय निरन्तर करना चाहिये ||7||

इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत् |
सहस्त्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ||8||
ऋग्वेद 1|11|8||

पदार्थ -

यस्य...............जिस जग्दीश्‍व‌र के ये सब
स्तोमाः............स्तुतियों के समूह
सहस्त्रम्...........हजारों
उत वा............अथवा
भूयसीः............अधिक
रातयः.............दान
सन्ति.............हैं. उस
ओजसा...........अनन्त बल के साथ वर्त्तमान
ईशानम्...........कारण से सब जगत को रचनेवाले तथा
इन्द्रम्.............सकल ऐश्‍वर्ययुक्त जगदीश्‍वर के
अभ्यमूषत........सब प्रकार से गुणकीर्त्तन करते हैं ||8||

भावार्थ -

जिस दयालु ईश्‍वर ने प्राणियों के सुख के लिये जगत् में अनेक उत्तम पदार्थ अपने पराक्रम से उत्पन्न करके जीवों को दिये हैं, उसी ब्रह्म के स्तुतिविधायक सब धन्यवाद होते हैं, इसलिये सब मनुष्यों को उसी का आश्रय लेना चाहिये ||8||

इस सूक्त में इन्द्र शब्द से ईश्‍वर की स्तुति, निर्भयता-सम्पादन, सूर्य्यलोक के कार्य्य, शूरवीर के गुणों का वर्णन, दुष्‍ट शत्रुओं का निवारण, प्रजा की रक्षा तथा ईश्‍वर के अनन्त सामर्थ्य के कारण करके जगत् की उत्पत्ति आदि के विधान से इस ग्यारहवें सूक्त की संङ्गति दशवें सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये |

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (26)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)
पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1060