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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः, (अथ द्वितीयः प्रकाशः)(2)

***ओउम्***

स्तुति विषय

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण
मस्नाविर शुद्धम‌पापविद्ध‌म् |
कविर्मनीषि परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोS
र्थान्व्यदधाच्छाश्‍व‌तीभ्याः समाभ्यः ||2||

यजुर्वेदे | अध्याये 40|8||

व्याख्यान -

"स, पर्यगात्" वह परमात्मा आकाश के समान सब जगह में परिपूर्ण (व्यापक) है |"शुक्रम्" सब जगत् का करने वाला वही है | "अकायम्"और वह कभी शरीर (अवतार) धारण नहीं करता, क्योंकि वह अखण्ड और अनन्त निर्विकार है | इससे देह धारण कभी नहीं करता | उससे अधिक कोई पदार्थ नहीं है | इसी से ईश्‍वर का शरीर धारण करना कभी नहीं बन सकता | "अब्रणम्" वह अखण्डैक‌रस अच्छेद्य अभेद्य निष्कम्प और अचल है इससे अशांशिभाव भी उसमें नहीं है, क्योंकि उसमें छिद्र किसी प्रकार से नहीं हो सकता | "अस्नाविरम्" नाड़ी आदि का प्रतिबन्ध (निरोध) भी उसका नहीं हो सकता | अति सूक्ष्म होने से ईश्‍वर को कोई आवरण नहीं हो सकता | "शुद्धम्" वह परमात्मा सदैव निर्मल अविद्या जन्म, मरण, हर्ष, शोक, क्षुधा तृषादि दोषोपाधियों से रहित है | शुद्ध की उपासना करने वाला शुद्ध ही होता है, और मलिन का उपासक मलिन ही होता है | अपापविद्वम्" परमात्मा कभी अन्याय नहीं करता, क्योंकि वह सदैव न्यायकारी ही है | "कविः" त्रैकालज्ञ, (सर्ववित्) महाविद्वान् जिसकी विद्या का अन्त कभी कोई नहीं ले सकता |"मनीषी" सब जीवों के मन (विज्ञान) का साक्षी सबके मन का दमन करने वाला है |"परिभूः" सब दिशा और सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है | सबके ऊपर विराजमान है | "स्वयम्भूः" जिसका आदिकारण माता, पिता, उत्पादक कोई नहीं किन्तु वही सब का आदिकारण है | याथातथ्यतोSर्थान्व्यदधाच्छाश्‍व‌तीभ्यः, समाभ्य:" उस ईश्‍वर ने अपनी प्रजा को यथावत् सत्य‌, सत्यविद्या जो चार वेद उनका सब मनुष्यों के परम-हितार्थ उपदेश किया है | उस हमारे दयामय पिता परमेश्‍वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक, वेद विद्यारूप सूर्य प्रकाशित किया है | और सबका आदिकारण परमात्मा है ऐसा अवश्‍य मानना चाहिए | ऐसे विद्यापुस्तक का भी आदिकारण‌ ईश्‍वर को भी निश्‍चित मानना चाहिए | विद्या का उपदेश ईश्‍वर ने अपनी कृपा से किया है | क्योंकि हम लोगों के लिए उसने सब पदार्थों का दान दिया है, तो विद्यादान क्यों न करेगा | सर्वोत्कृष्‍टविद्या पदार्थ का दान परमात्मा ने अवश्‍य किया है, तो वेद के बिना अन्य कोई पुस्तक संसार में ईश्‍वरोक्त नहीं है | जैसा पूर्ण विद्यावन् और न्यायकारी ईश्‍वर है वैसा ही वेद पुस्तक भी है | अन्य कोई पुस्तक ईश्‍वरकृत वेदतुल्य व अधिक नहीं है | अधिक विचार इस विषय का "सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका" मेरे किए ग्रन्थों में देख लेना ||2||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'
पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1156