Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

इन्द्र ! श्रेष्ठ धन दे

ओउम् | इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि थेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे |
पोषं रयीणामरिष्‍टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम् ||

ऋग्वेद 2/21/6

शब्दार्थ -

हे इन्द्र................हे अखिलैश्‍वर्य्यसम्पन्न परमेश्‍वर !
अस्मे.................हमारे लिए
श्रेष्ठानि................श्रेष्ठ्
द्रविणानि.............धनों को
धेहि...................दे |
दक्षस्य................उत्साह के, चतुरता के, सत्कर्म्म् के
चित्तिम्................ज्ञान को,
सुभगत्व‌म्.............सौभाग्य को,
रयीणाम्+पोषम्.......धनों की पुष्टि को
तनूनाम्+अरिष्टिम्.....शरीर की हानि के अभाव को = नीरोगता को
वाचः+स्वाद्मानम्.......वाणी के स्वाद को
अह्नाम्+सुदिनत्वम्.....दिनों के सुदिनत्व को तू हमें दे |

व्याख्या -

इस मन्त्र में सभी आवश्‍यक भद्र, श्रेष्ठ पदार्थों की प्रार्थना ईश्‍वर से की गई है -

(1) दक्षस्य चित्तिम् - उत्साह, सत्कर्म का ज्ञान | जीवन में सफलता के लिए सबसे पूर्व कर्त्तव्य-कर्म्म का ज्ञान होना चाहिए और उस कर्म्म के लिए भरपूर उत्साह भी होना चाहिए | कोरे ज्ञान से कभी सफलता नहीं होती | ना ही ढीले ढाले बेढंगे, आस्थारहित भाव से किया कर्म्म सफल होता है, अतः सबसे प्रथम उत्साहपूर्ण सुकर्म्म का ज्ञान और अनुष्‍ठान होना चाहिए |

(2) सुभगत्वं - सौभाग्य | सारे साधन हों और भाग्य अच्छा न हो, तो महान प्रतिबन्ध खड़ा हो जाता है, किन्तु सौभाग्य-दौर्भाग्य का मिलना मनुष्य के अपने अधीन है | इस सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए ही भगवान् ने पहले दक्ष की चित्ति का विधान किया अर्थात् भाग्य कर्म्मानुसार ही बनेगा | पिछले में परिवर्तन नहीं हो सकता | आगे को भाग्य अच्छा बने, इसके लिए कर्म्म करने की आवश्‍यकता है | इसी भाव से योगिराज पत्तङ्जलि जी ने हेयें दुःखमनागतम् (यो. द्. 2/16) - कहा | पूर्वकर्म्म के फलस्वरूप दुःख भोगना ही पड़ेगा, जो वर्त्तमान में फलोन्मुख है, वह फल देकर ही हटेगा | भविष्यत् दुःख से बचा रहे, इसके लिए पुरुषार्थ करना चाहिए | भाग्य कर्म्माधीन है, यह सर्वथा निश्‍चित है |

(3) पोषं रयीणाम्- धन की पुष्टि | सांसारिक जीवन में धन की आवश्यकता का अपलाप नहीं किया जा सकता | वेद में प्रार्थना भी है - वयं स्याम पतयो रयीणाम् (ऋ.10/121/10) - हम धनों के स्वामी होवें | दूसरे स्थान पर कहा है - वस्वी ते अग्ने सन्दृष्‍टिरिषय‌ते मर्त्याय‌ (ऋ.6/16/25) = हे अग्ने ! धनाभिलाषी मनुष्य के लिए तेरी 'सन्दृष्‍टिः' वस्वी=धनदात्री हो | कर्म्म और भाग्य, पुरुषार्थ‌ और प्रारब्ध मिलकर धनवृद्धि के साधन देते हैं |

(4) अरिष्‍टं तनूनाम् - शरीर की अक्षति | वैद्य कहते हैं - शरीरं धर्म्मसाधनम् = शरीर धर्म्म का साधन है, अतः शरीर सदा निरोग रहे, बलवान रहे | ऋग्वेद (6/75/12)में कहा है - अश्मा भवतु नस्तनूः = हमारा शरीर वज्रसमान हो |

(5) स्वाद्मानं वाचः - वाणी में मिठास | वाणी आग और जल दोनों का कार्य करती है | सन्तप्त ह्रदयों को मधुरभाषी उपदेश‌कुशल अपने वाक्कुशल से शान्त करके उनका ताप मिटा देता है और इसी वाणी से झगड़े भी होते हैं | तलवार का घाव भर जाता है किन्तु - वाक्‍क्षतं न प्ररोहति = वाणी की चोट नहीं भरती, अतः वाणी का सँभालकर् प्रयोग करना चाहिए | सन्ध्या में ओं स्वः पुनातु कण्ठे का मनन करो |

(6) सुदिनत्वमह्नाम् = दिन अच्छे बीतें | किसी कवि ने कहा - वेदशास्त्रविचारेण कालो गच्छति धीमताम् | व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा = बुद्धिमानों का समय वेदों और शास्त्रों के विचार में व्यय होता है, किन्तु मूर्खों का व्यसन, निद्रा और कलह में बीतता है | भले कर्म्म करेंगे, तो भले दिन बनेंगे |

यह छह श्रेष्‍ठ धन हैं | यजुर्वेद में श्रेष्‍ठ धन का एक लक्षण लिखा है, वह बहुत सुन्दर है - सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देवं राधो जनानाम् (य. 15/34) = लोगों के लिए उत्तम ब्रह्मायुक्त और उत्तम शान्ति देनेवाला यज्ञ ही धनों में से दिव्य धन है | ब्रह्मा पर यज्ञ का निर्भर है | यज्ञ का फल उत्तम शान्ति - मृत्युसमान शान्ति नहीं - है | यह यदि मिल जाए तो फिर क्या कहना ! सामवेद में भी कहा है - सं पदं मघं रयीषिणे = शान्ति ही धनाभिलाषी के लिए प्राप्त करने योग्य धन है | जिसके पास यह नहीं, वह या निर्धन है, या निर्धन अवस्था में है ||

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)

This is good work .

This is good work .