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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (4)

(गतांक से आगे)

जब जब मनुष्य लोग ईश्‍वर की उपासना करना चाहें, तब तब इच्छा के अनुकूल एकान्त स्थान में बैठकर, अपने मन को शुद्ध और आत्मा को स्थिर करें तथा सब इन्द्रिय और मन को सच्चिदानन्दादि लक्षण वाले अन्तर्यामी अर्थात् सब में व्यापक और न्यायकारी परमात्मा की ओर अच्छी प्रकार से लगा कर, सम्यक् चिन्तन करके, उसमें अपनी आत्मा को नियुक्‍त करें | फिर उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना को बारंबार करके, अपने आत्मा को भलीभांति से उसमें लगा दें | इसकी रीति पतङ्जलि मुनि के किये योगशास्त्र और उन्हीं सूत्रों के वेदव्यासमुनि जी के किये भाष्य के प्रमाणों से लिखते हैं | -

(योगश्चित्त.) चित्त की वृत्तियों को सब बुराइयों से हटा के, शुभ गुणों में स्थिर करके, परमेश्वर के समीप में मोक्ष को प्राप्त करने को योग कहते हैं | और वियोग उसको कहते हैं कि परमेश्वर और उसकी आज्ञा से विरुद्ध बुराइयों में फंस के उससे दूर हो जाना ||1||

(प्रश्न‌) जब वृत्ति बाहर के व्यवहारों से हटा के स्थिर की जाती है, तब कहां पर स्थिर होती है ?

इसका उत्तर यह है कि - (तदा द्र.) जैसे जल के प्रवाह को एक और से द्दृढ़ बाँध के रोक देते हैं, तब वह जिस और नीचा होता है, उस ओर चल के कहीं स्थिर हो जाता है , इसी प्रकार मन की वृत्ति भी जब बाहर से रुकती है, तब परमेश्वर में स्थिर हो जाती है | एक तो चित्त की वृत्ति को रोकने का यह प्रयोजन है ||2||

और दूसरा यह है कि - (वृत्तिसा.) उपासक योगी और संसारी मनुष्य जब व्यवहार में प्रवृत होते हैं तब योगी की वृत्ति तो सदा हर्षशोकरहित, आनन्द से प्रकाशित होकर उत्साह और आनन्दयुक्‍त रहती है और संसार के मनुष्य की वृत्ति सदा हर्षशोकरूप दु:खसागर में ही डूबी रहती है | उपासक योगी की तो ज्ञानरूप प्रकाश में सदा बढ़ती रहती है और संसारी मनुष्य की वृत्ति सदा अन्धकार में फंसती जाती है ||3||

(वृत्तयः.) अर्थात् सब जीवों के मन में पांच प्रकार की वृत्ति उत्पन्न होती है | उसके दो भेद हैं एक क्लिष्ट, दूसरी अक्लिष्ट, अर्थात् क्लेश सहित और क्लेशरहित | उनमें से जिनकी वृत्ति विषयासक्त परमेश्वर की उपासना से विमुख होती है उनकी वृत्ति अविद्यादि क्लेशसहित, और जो पूर्वोक्त उपासक हैं उनकी क्लेशरहित शान्त होती है ||4||

वे पांच वृत्ति ये हैं - पहिली (प्रमाण) दूसरी (विपर्य्यय) तीसरी (विकल्प) चौथी (निद्रा) और पांचमी (स्मृति) ||5||

उनके विभाग और लक्षण ये हैं - (तत्र प्रत्यक्षा.) इसकी व्याख्या वेदविषय के होमप्रकरण में लिख दी है ||6||

(विपर्य्ययो.) दूसरी विपर्य्यय कि जिससे मिथ्याज्ञान हो अर्थात् जैसे को तैसा न जानना अथवा अन्य में अन्य की भावना कर लेना, इसको विपर्य्यय कहते हैं ||7||

तीसरी विकल्पवृत्ति (शब्दज्ञाना.) जैसे किसी ने किसी से कहा कि एक देश में हमने आदमी के शिर पर सींग देखे थे | इस बात को सुन के कोई मनुष्य निश्चय करले कि ठीक है सींगवाले मनुष्य भी होते होंगे | ऐसी वृत्ति को विकल्प कहते हैं | सो झूठी बात है अर्थात् जिसका शब्द तो हो परन्तु किसी प्रकार का अर्थ किसी को न मिल सके, इसी से इसका नाम विकल्प है ||8||

चौथी (निद्रा) अर्थात् जो वृत्ति अज्ञान और अविद्या के अन्धकार में फंसी हो, उस वृत्ति का नाम निद्रा है |||9||

पांचमी (स्मृति) (अनुभूत.) अर्थात् जिस व्यवहार वा वस्तु को प्रत्यक्ष देख लिया हो, उसी का संस्कार ज्ञान में बना रहता और उस विषय को (अप्रमोष) भूले नहीं, इस प्रकार की वृत्ति को स्मृति कहते हैं ||10||

इन पांच वृत्तियों को बुरे कामों और अनीश्वर के ध्यान से हटाने का उपाय कहते हैं कि - (अभ्यास.) जैसा अभ्यास उपासना प्रकरण में आगे लिखेंगे वैसा करें और वैराग्य अर्थात् सब बुरे कामों और दोषों से अलग रहें | इन दोनों उपायों से पूर्वोक्त पांच वृत्तियों को रोक के उनको उपासनायोग में प्रवृत्त रखना ||11||

तथा उस समाधि के योग होने का यह भी साधन है कि (ईश्वरप्र.) ईश्वर में विशेष भक्ति होने से मन का समाधान होके मनुष्य समाधियोग को शीघ्र प्राप्त हो जाता है ||12||

(क्रमशः)

पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1210