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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपदेश मञ्ज‌री (1)

******ओउम्******

प्रथम उपदेश
(ईश्‍वर सिद्धि विषयक)

[स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पूना के बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में तारीख 4 जौलाई सन् 1875 (आषाढ़ शुक्ला 1, रवीवार वि. स. 1932). के दिन रात्रि समय में जो व्याख्यान दिया था, उसका सारांश निम्नलिखित है - ]

ओउम शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा |
शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरूरुक्रमः ||
[ऋग्वेद 1/90/9||]

नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि | त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि | [ऋतं वदिष्यामि | सत्यं वदिष्यामि | तन्मामवतु |
तद् वक्तारमवतु | अवतु माम | अवतु वक्तावरम् ||]
[तै.उप. शिक्षावल्ली 1/1 ||]

[इत्यादि * पाठ स्वामी जी ने प्रथम कहा -]

'ओउम्' यह ईश्‍वर का सर्वोत्कृष्‍ट नाम है, क्योंकि इसमें उसके सब गुणों का समावेश होता है |
प्रथम हमें ईश्‍वर की सिद्धि करनी चाहिए, उसके पश्‍चात् धर्म-प्रबन्ध का वर्णन करना योग्य है, क्योंकि "सति कुड्ये चित्रम्" इस न्याय से जब तक ईश्‍वर की सिद्धि नहीं होती तब तक धर्म-व्याख्यान करने का अवकाश नहीं है |

स प्र्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाजिरं शुद्धमपापविद्वम् |
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्यायातथ्यतोSर्थात् व्यदधाच्छाश्‍वतीभ्यः समाभ्यः ||
न तस्य कार्यं कारणं च [विद्यते न तत्समश्‍चाभ्यधिकश्‍च दृष्यते |]
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ||
[श्वेता. उप. 6/8 ||]
[ये वाक्य कहकर स्वामी जी ने इनकी व्याख्या की |]

मूर्त्त देवताओं में ये गुण नहीं लगते | इसलिए मूर्त्ति-पूजा निषिद्ध है | इस पर कोई ऐसी शङ्का करते हैं कि रावणादिकों के सदृश दुष्‍टों का पराभव करने के लिए भक्तों को मुक्‍ति देने के अर्थ [ईश्‍वर को] अवतार लेना चाहिये ; परन्तु ईश्‍वर सर्वशक्‍तिमान् है ; इससे अवतार की आवश्यक्‍ता दूर होती है, क्योंकि इच्छा मात्र से वह रावण [जैसों] का वह नाश तो कर सकता था | इसी प्रकार भक्‍तों को उपासना करने के लिए ईश्‍वर का कुछ आकार होना चाहिए, ऐसा भी बहुत से लोग कहते हैं ; परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है ; क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है, वह भी आकार रहित है, यह सब कोई मानते हैं अर्थात् वैसा आकार न होते हुए भी हम एक दूसरे को पहिचानते हैं, और प्रत्यक्ष कभी न देखते हुए भी केवल गुणानुवादों ही से सद्भावना और पूज्यबुद्धि [अदृष्‍ट] मनुष्य के विषय में रखते हैं | उसी प्रकार ईश्‍वर के सम्बन्ध में नहीं हो सकता, यह कहना ठीक नहीं है | इसके सिवाय मन का आकार नहीं है, मन द्वारा परमेश्‍वर ग्राह्य है, उसे जड़ेन्द्रिय-ग्राह्यता लगाना यह अप्रयोजक है |

श्रीकृष्ण जी एक भद्र पुरुष थे | उनका महाभारत में उत्तम वर्णन किया हुआ है, परन्तु भागवत में उन्हें सब प्रकार के दोष लगाकर उनके दुर्गुणों का ढिंढोरा पीटा है |

ईश्‍वर सर्वशक्‍तिमान् है | इस शक्‍तिमान का अर्थ क्या है ? "कर्तुमकर्तुमन्य‌था कर्तुम्" ऐसी शक्‍ति से तात्पर्य नहीं है | किन्तु सर्वशक्‍तिमान् का अर्थ न्याय न छोड़ते हुए काम करने की शक्‍ति रखना, यही सर्वशक्तिमान् से तात्पर्य है | कोई कोई कहते हैं कि ईश्‍वर ने अपना बेटा पाप-मोचनार्थ जगत् में भेजा, कोई कहते हैं कि पैगम्बर को उपदेशार्थ भेजा, सो यह सब कुछ करने की परमेश्‍वर को कुछ भी आवश्यक्‍ता न थी ; क्योंकि वह सर्वशक्‍तिमान् है |

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* आदि पद से सूचित शेष मन्त्रपाठ कोष्ठक में दे दिया गया है |
(क्रमशः)