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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' तृत्तीयः विभूतिपादः (1)

पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1346

देशबन्धश्‍चित्तस्य धारणा ||1||

[देशबन्धः] किसी स्थान विशेष पर स्थिर करना [चित्तस्य] चित्त का (को) [धारणा] धारणा कहलाती है |

ईश्‍वर का ध्यान करने के लिए आँखें बन्द करके मन को मस्तक, भूमध्य, नासिका, कण्ठ, ह्रदय, नाभी आदि किसी एक स्थान पर स्थिर करने या रोकने का नाम 'धारणा' है |

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ||2||

[तत्र] धारणा वाले स्थान पर‌ [प्रत्ययैकतानता] एक वस्तु के ज्ञान का प्रवाह बना रहना [ध्यानम्] ध्यान कहलाता है |

किसी एक स्थान पर मन को स्थिर कर देने के पश्‍चात वेदमन्त्र या अन्य शब्दों के माध्यम से ईश्‍वर को प्राप्त करने (= जानने = अनुभव करने) के लिए, ईश्‍वर के गुण-कर्म-स्वभाव का निरन्तर चिन्तन करना किन्तु बीच में किसी अन्य वस्तु या विषय का स्मरण न करना, 'ध्यान' कहलाता है |

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ||3||

[तदेव] वह (ध्यान) ही [अर्थमात्रनिर्भासम्] केवल वस्तु के स्वरूप को प्रकाशित करने वला [स्वरूपशून्यम् इव] अपने स्वरूप से रहित हुआ हुआ सा [समाधिः] समाधि कहलाता है |

'शब्द प्रमाण' तथा 'अनुमान प्रमाण' के माध्यम से ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का निरन्तर चिन्तन करते रहने पर जब ईश्‍वर का प्रत्यक्ष होता है अर्थात् ईश्‍वर के आनन्द में साधक निमग्न हो जाता है, तब उस अवस्था को समाधि कहते हैं | ध्यान और समाधि में अन्तर = भेद यह है कि ध्यान में ईश्‍वर की खोज चलती रहती है और जब ईश्‍वर की खोज पूर्ण होकर ईश्‍वर का प्रत्यक्ष हो जाता है तो वही समाधि कहलाती है |

त्रयमेकत्र संयमः ||4||

[त्रयम] तीनों का [एक‌त्र] एक ही विषय (ध्येय) में होना [संयमः] संयम कहलाता है |

जब धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एक ही विषय में उपस्थित किये जाते हैं तो वह संयम कहलाता है | यह संयम की शास्त्रीय परिभाषा है | अर्थात् आगे जहाँ जहाँ सूत्रों व भाष्य में कहा जायेगा कि अमुक विषय में संयम करने से अमुक-अमुक लाभ होता है वहाँ वहाँ संयम का अर्थ होगा कि उस-उस विषय में धारणा-ध्यान-और समाधि तीनों लगाने से वह लाभ होता है | जिस वस्तु में धारणा की जाये उसी वस्तु का ध्यान किया जाये और उसी वस्तु में समाधि लागायी जाये | यदि शरीर के किसी अंगविशेष में धारणा की जाये और ध्यान किसी अन्य वस्तु का किया जाये तो संयम नहीं कहलायेगा |

तज्जयात् प्रज्ञाSSलोकः ||5||

[तत्-ज‌यात्] उस संयम पर विजय प्राप्त कर लेने से [प्रज्ञाSSलोकः] समाधिबुद्धि का विकास होता है |

उस संयम का उत्कृष्ट अभ्यास करके उस पर अधिकार कर लेने से समाधिबुद्धि विकसित होती है, अर्थात् समाधि में प्राप्त हुए ज्ञान‌ की दृढ़ता, स्पष्टता और निर्मलता होती है |

(क्रमशः)

[सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
लेखक - श्री ज्ञानेश्वरार्यः - M.A. दर्शनाचार्य, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़, गुजरात के सौजन्य से साभार‌ प्रेषित]