Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (27)

अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्वेदसम् |
अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ||1||
ऋग्वेद 1/12/1

पदार्थ -

क्रिया करने की इच्छा करनेवाले हम मनुष्यलोग
अस्य...............प्रत्यक्ष सिद्ध करने योग्य
यज्ञस्य............शिल्पविद्यारूप यज्ञ के
सुक्रतुम्...........जिससे उत्तम उत्तम क्रिया सिद्ध होती है, तथा
विश्‍ववेदसम्.......जिससे कारीगरों को सब शिल्प आदि साधनों का लाभ होता है,
होतारम्...........यानों में वेग आदि को देने
दूतम्...............पदार्थों को एक देश से दूसरे देश को प्राप्त करने
अग्निम्............सब पदार्थों को अपने तेज से छिन्न भिन्न करनेवाले भौतिक अग्नि को
वृणिमहे............स्वीकार करते हैं ||1||

भावार्थ -

ईश्‍वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि - यह प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष से विद्वानों ने जिसके गुण प्रसिद्ध किये हैं तथा पदार्थों को ऊपर नींचे पहुंचाने से दूत स्वभाव तथा शिल्पविद्या से जो कलायन्त्र बनते हैं, उनके चलाने में हेतु और विमान आदि यानों में वेग आदि क्रियाओं का देनेवाला भौतिक अग्नि अच्छी प्रकार विद्या से सब सज्जनों के उपकार के लिये निरन्तर ग्रहण करना चाहिये, जिससे सब उत्तम उत्तम सुख हों ||1||

अग्निमग्नि हवीमभिः सदा हवन्त विश्‍पतिम् |
हव्यवाहं पुरुप्रियम् ||2||
ऋग्वेद 1/12/2

पदार्थ -

जैसे हम लोग
हवीमभिः............ग्रहण करने योग्य उपासनादिकों तथा शिल्पविद्या के साधनों से
पुरुप्रियम्............बहुत सुख करानेवाले
विश्पतिम्..........प्रजाओं के पालन हेतु और
हव्यवाहम्............देने लेने योग्य पदार्थों को देने और इधर उधर पहुँचानेवाले
अग्निम्..............परमेश्‍वर, प्रसिद्ध अग्नि और बिजली को
वृणीमहे..............स्वीकार करते हैं, वैसे ही तुम लोग भी सदा
हवन्त................उसका ग्रहण करो ||2||

भावार्थ -

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है | और पिछले मन्त्र से 'वृणीमहे' इस पद की अनुवृत्ति आती है | ईश्‍वर सब मनुष्यों के लिये उपदेश करता है कि - हे मनुष्यो ! तुम लोगों को विद्युत अर्थात् बिजुलीरूप तथा प्रत्यक्ष भौतिक अग्नि से कलाकौशल आदि सिद्ध करके इष्‍ट सुख सदैव भोगने और भुगवाने चाहियें ||2||

अग्ने देवाँ इहावह जज्ञानो वृक्तवर्हिषे |
असि होता न ईड्यः ||3||
ऋग्वेद 1/12/3

पदार्थ -

हे
अग्ने.................स्तुति करने योग्य जग्दीश्‍वर ! जो आप
इह....................इस स्थान में
जज्ञानः................प्रक‌ट कराने वा
होता...................हवन किये हुए पदार्थों को ग्रहण करने तथा
ईडयः..................खोज करने योग्य
असि...................हैं, सो
नः.....................हम लोग और
वृक्‍तबर्हिषे.............अन्तरिक्ष में होम के पदार्थों को प्राप्त करनेवाले विद्वान के लिये
देवाऩ्..................दिव्यगुणयुक्त पदार्थों को
आवह..................अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये ||1||

जो
होता...................हवन किये हुए पदार्थों का ग्रहण करने तथा
जज्ञानः................उनकी उत्पत्ति करानेवाला (अग्ने) भौतिक अग्नि
वृक्‍तबर्हिषे.............जिसके द्वारा होम किये पदार्थ अन्तरिक्ष में पहुँचाये जाते हैं, वह उस ऋत्विज के लिये
इह....................इस स्थान में
देवाऩ्..................दिव्यगुणयुक्त पदार्थों को
आवह..................सब प्रकार से प्राप्त करता है | इस कारण‌
नः.....................हम लोगों को वह‌
ईडयः..................खोज करने योग्य
असि...................होता हैं ||2||3||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्‍लेषालङ्कार है | हे मनुष्य लोगो ! जिस प्रत्यक्ष अग्नि में सुगन्धि आदि गुणयुक्त पदार्थों का होम किया करते हैं, जो उन पदार्थों के साथ अन्तरिक्ष में ठहरनेवाले वायु और मेघ के जल को शुद्ध करके इस संसार में दिव्य सुख उत्पन्न करता है, इस कारण हम लोगों को इस अग्नि के गुणों का खोज करना चाहिये, यह ईश्‍वर की आज्ञा सबको अवश्य माननी योग्य है ||3||

ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम् |
देवैरा सत्सि बर्हिषि ||4||
ऋग्वेद 1/12/4

पदार्थ -

यह
अग्ने...................अग्नि
यत्.....................जिस कारण
बर्हिषि..................अन्तरिक्ष में
देवैः.....................दिव्य पदार्थों के संयोग से
दूत्यम्.................दूत भाव को
आयासि................सब प्रकार से प्राप्त होता है,
ताऩ्....................उन दिव्य गुणों को
विबोधय................विदित करानेवाला होता और उन पदार्थों के
सत्सि..................दोषों का विनाश करता है, इससे सब मनुष्यों को विद्या सिद्धि के लिये इस अग्नि की ठीक ठीक परीक्षा करके प्रयोग करना चाहिये ||4||

भावार्थ -

परमेश्‍वर आज्ञा देता है कि - हे मनुष्यो ! यह अग्नि तुम्हारा दूत है, क्योंकि हवन किये हुए परमाणुरूप पदार्थों को अन्तरिक्ष में पहुँचाता और उत्तम उत्तम पदार्थों की प्राप्ति का हेतु है | इससे सब मनुष्यों को अग्नि के जो प्रसिद्ध गुण हैं, उनको संसार में अपने कार्य्यों की सिद्धि के लिये अवश्य प्रकाशित करना चाहिये ||4||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (27)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)
पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1347