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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

हनुमानजी बन्दर नहीं - हमारे जैसे मनुष्य ही थे

हनुमानजी से श्रीरामचन्द्रजी की प्रथम बार भेंट ॠष्यमूक पर्वत पर हुई थी । दोनों में परस्पर बातचीत के बाद श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजी से बोले -

(1) नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण: । ना सामवेदविदुष: शक्यमेवं प्रभाषितुम् ।।
(2) नूनं व्याकरणं कृ्त्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरता तेन न किंचितदपश्ब्दितम् ।।
(3) संस्कारक्रम संपन्नामदुतामविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम् ।।
(- वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, 3-28,29,32)

अर्थ:
1.ऋग्वेद के अध्ययन से रहित और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं है, तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता ।
2.निश्चय ही उन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है, क्योंकि इतने समय तक बोलने में इन्होंने किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है ।
3.संस्कार सम्पन्न, शास्त्रीय पद्धति से उच्चारण की हुई इनकी कल्याण वाणी हृदय को हर्षित कर रही है ।

उक्त प्रमाणों के आधार पर यही सिद्ध होता है कि हनुमानजी बन्दर नहीं - हमारे जैसे मनुष्य ही थे । उनको बन्दर मानने वाले लोग उनके भक्त नहीं, बल्कि उनके निन्दक ही माने जाने चाहिए । महात्मा हनुमानजी की तरह हमें भी वेद-वेदांगों का अध्ययन करना चाहिए ।

= भावेश मेरजा

बन्दर

बन्दर मानने का एक कारण यह भी संभव है कि वह व उनकी सेना ने वानर रूपी किसी विशेष रक्षा परिधान का प्रयोग किया हो,जैसा कि आज की कुछ विशेष परिस्थितियों में लड़ने वाली सेनाएं भी करती हैं | हनुमान जी को वानर मानना निश्‍चय ही बुद्धिमता की बात प्रतीत नहीं होती |