Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः, (अथ द्वितीयः प्रकाशः)(3)

***ओउम्***

प्रार्थना विषय

दृते दृँ,ह मा मित्रस्य मा चक्षुषा
सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् |
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे |
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ||3||

य. 36|18||

व्याख्यान -

हे अनन्तबल महावीर ईश्‍वर ! "दृते" हे दुष्‍ट‌स्वभावनाशक विदीर्णकर्म अर्थात् विज्ञानादि शुभ गुणों का नाश क‌रने वाला मुझको मत रखो (मत करो) किन्तु उससे मेरे आत्मादि को विद्या सत्यधर्मादि शुभ गुणों में सदैव अपनी कृपा सामर्थ्य से स्थित करो "दृँ,ह मा" हे परम ऐश्‍वर्यवान् भगवन् ! धर्मार्थकाममोक्षादि तथा विज्ञानादि दान से अत्यन्त मुझको बढ़ा | "मित्रस्येत्यादि." हे सर्व सुह्र्दीश्‍वर सर्वान्तर्य्यामिन् ! सब भूत प्राणिमात्र मित्रदृष्टि से यथावत् मुझको देखें | सब मेरे मित्र हो जाएँ | कोई मुझसे किंचिन्मात्र भी वैर न करे | "मित्रस्याहं, चेत्यादि" हे परमात्मन् ! आपकी कृपा से मैं भी निर्वैर होके सब चराचर जगत् को मित्रदृष्‍टि से अपने प्राणवत् प्रिय जानूं |अर्थात् " मित्रस्य चक्षुषेत्यादि" पक्षपात छोड़ के सब जीव-देहधारी मात्र अत्यन्त प्रेम से परस्पर अपना वर्त्ताव करें | अन्याय से युक्त होके किसी पर कभी हम लोग न वर्त्तें | यह परमधर्म का सब मनुष्यों के लिए परमात्मा का उपदेश किया है | सबको यही मान्य होने के योग्य है ||3||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'
पूर्व संदर्भ -
http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1350