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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

क्या कहूँ और क्या सोचूँ

ओ3म् | वि मे कर्णा पतयतो वि चक्षुर्वी3दं ज्योतिर्ह्रदय आहितं यत् |
वि मे मनश्‍चरति दूरआधीः किं स्विद्वक्ष्यामि किमु नू मनिष्ये ||
ऋग्वेद 6|9|6

शब्दार्थ -

मे....................मेरे
कर्णा.................कान
वि+पतयतः.........विविध् दिशाओं में गिरा रहे हैं, भगा रहे हैं |
चक्षुः.................मेरी आँख भी
वि....................विविध रूपों में मुझे गिरा रही हैं | इनके कारण
इदं+ज्योतिः.........यह ज्योति भी,
यत्..................जो
ह्रदये.................ह्रदय में
आहितम्.............निहित है
वि....................विविध वासनाओं में दौड़ रही है |
मे....................मेरा
मनः.................मन
दूरे...................दूर के
आधीः................विचारों में
विचरति..............विचर रहा है
किं+स्वित्...........क्या
वक्ष्यामि..............मैं कहूँ और
किम्+उ+नु..........क्या तो मैं
मनिष्ये...............मनन करूँ |

व्याख्या -

कितनी करुण पुकार है ! भगवान् ने आत्मज्योति के साक्षात्कार का आदेश दिया | जीव समझा यह भी कोई इन्द्रियगोचर पदार्थ है, अतः इन्द्रियों से उसे देखने का, जानने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु उसे पता लगा कि इन्द्रियाँ मेरे बस में हैं ही नहीं | कानों को कहा - कहीं से आत्माराम की बात सुनना तो बताना | कान चले, किन्तु मार्ग में बाजा सुनाई पड़ा, कान वहीं रुक गये | वापस न आये | आँख को भेजा, तुम जाओ, तुम आत्मा को देखो, खोजो | रूप की प्यासी आँख के सामने नयनाभिराम दृश्‍य आया | आँख सर्वात्मना उसके देखने में तन्मय हो गई | इसी भाँति अन्य इन्द्रियों ने कार्य्य किया | यहीं तक बात होती तो कदाचित् सहन कर ली जाती, किन्तु ये तो जब कहीं गई, आत्मज्योति को भी साथ लेती गईं |

वीदं ज्योतिर्ह्रदय आहितं यत् = यह ह्रदय के भीतर रहनेवाली ज्योति-आत्म-ज्योति भी इन्द्रियों के साथ विविध विषयों में गिर रही है | शास्त्र कहते हैं - आत्मा जिज्ञासते, अनन्तरं मनसा संयुज्यते, मनः इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन, ततो ज्ञानोद्‍भवः | आत्मा पहले जानने की इच्छा करता है, तब मन से संयुक्‍त होता है, मन इन्द्रियों से, इन्द्रिय पदार्थ से, तब ज्ञान होता है | जब आत्मा ही इधर उधर भाग रहा है, तब उसके साथ करण-अन्तःकरण-अन्तरंग साधन-बनकर मन कहाँ ठहर सकता है ? अतः कहा है - वि मे मनश्‍चरति दूर आधीः मेरा मन भी दूर दूर के विचारों में विचर रहा है | अर्थात् इन्द्रियों के विषयों के चक्कर में पड़कर आत्मा अपना लक्ष्य खो बैठा है, अतः रोता हुआ कहता है -किं स्विद्वक्ष्यामि किमु नू मनिष्ये = क्या कहूँ और क्या विचारूँ | आत्मा ने अपनी भूल से सेवकों को स्वामी बना दिया है | इसी से दुर्दशाग्रस्त हो रहा है | यह उल्टी अवस्था पाप को पैदा करनेवाली है | जैसा अथर्ववेद (5/18/2) में कहा है - अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः= इन्द्रियों के विद्रोह से आत्मपराजय होता है, और वही पाप है | आत्मा को पुनः स्वामी बना दो, राजा बना दो | इन्द्रियों का द्रोह दब जाएगा, और पाप भी नष्ट हो जाएगा |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार प्रेषित)