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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (5)

पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1353

(गतांक से आगे)

अब ईश्‍वर का लक्षण कहते हैं कि (क्लेश्कर्म.) अर्थात् इसी प्रकरण में आगे लिखे हैं जो अविद्यादि पांच क्लेश और अच्छे बुरे कर्मों की जो जो वासना, इन सबसे जो सदा अलग और बन्धरहित है. उसी पूर्ण पुरुष को ईश्वर कहते हैं | फिर वह कैसा है ? जिससे अधिक व तुल्य दूसरा पदार्थ कोई नहीं तथा जो सदा आनन्दज्ञानस्वरूप सर्वशक्तिमान है, उसी को ईश्वर कहते हैं ||13||

क्योंकि (तत्र निरति.) जिसमें नित्य सर्वत्र ज्ञान है वही ईश्वर है | जिसके ज्ञानादि गुण अनन्त हैं, जो ज्ञानादि गुणों की पराकाष्‍ठा है, जिसके सामर्थ्य की अवधि नहीं | और् जीव के सामर्थ्य की अवधि प्रत्यक्ष देखने में आती है, इसलिए सब जीवों को उचित है कि अपने ज्ञान बढ़ाने के लिये सदैव् परमेश्वर की उपासना करते रहें ||14||

अब उसकी भक्ति किस प्रकार से करनी चाहिये, सो आगे लिखते हैं - (तस्य वा.) जो ईश्वर का ओंकार नाम है सो पिता पुत्र के सम्बन्ध के समान है और यह नाम ईश्वर को छोड़ के दूसरे अर्थ का वाची नहीं हो सकता | ईश्वर के जितने नाम हैं, उनमें से ओंकार सबसे उत्तम नाम है ||1||

इसलिये (तज्जप.) इसी नाम का जप अर्थात् स्मरण और उसी का अर्थविचार सदा करना चाहिये कि जिससे उपासक का मन एकाग्रता, प्रसन्नता और ज्ञान को यथावत् प्राप्त होकर स्थिर हो | जिससे उसके ह्रदय में परमात्मा का प्रकाश और परमेश्वर की प्रेम-भक्ति सदा बढ़ती जाय ||17||

(क्रमशः)