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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपदेश मञ्जरी (2)

******ओउम्******

प्रथम उपदेश
(ईश्वर सिद्धि विषयक)
पूर्व संदर्भ http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1357
(अब गतांक से आगे)

बल ज्ञान और क्रिया ये सब शक्ति के प्रकार हैं | बल ज्ञान और क्रिया अनन्त होकर स्वाभाविक भी हैं | ईश्वर का आदि कारण नहीं है | आदि कारण मानने पर अनवस्था प्रसंग आता है | निरीश्वरवाद की उत्पत्ति सांख्यशास्त्र से हुई प्रतीत होती है, परन्तु सांख्य-शास्त्रकार कपिल मुनि निरीश्वरवादी न थे | उनके सूत्रों का आधार लेकर कपिल निरीश्वरवादी थे, ऐसा कोई कहते हैं ; पर उनके सूत्रों का अर्थ ठीक-ठीक नहीं किया जाता | वे सूत्र निम्नलिखित हैं -

ईश्वरसिद्धे: | मुक्तबद्धमोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः |
उभ्यथाप्यसत्करत्वम् | .........
[सांख्य 1|92,93,94,95 ||]

परन्तु सूत्रसाहचर्य से विचार करने पर ईश्वर एक ही है, दूसरा ईश्वर नहीं है, ऐसा भगवान् कपिल मानते थे, क्योंकि 'पुरुष है' ऐसा उनका सिद्धान्त था | वही पुरुष सहस्त्र-शीर्षादि सूक्तों* में वर्णन किया हुआ है | उसी के सम्बन्ध से वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम ** इत्यादि कहा हुआ है |

प्रमाण बहुत प्रकार के हैं - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और शब्द इत्यादि | भिन्न भिन्न शास्त्रकार प्रमाणों की भिन्न-भिन्न संख्या मानते है |

मीमांसा-शास्त्रकार जैमिनिजी दो प्रमाण मानते हैं | गौतम न्याय-शास्त्रकार आठ, कोई-कोई अन्य शास्त्रकार चार, पतञ्जलि योग-शास्त्रकार तीन प्रमाण, सांख्य शास्त्रकार तीन, वेदान्त ने तो छः प्रमाण स्वीकार किए हैं | परन्तु भिन्न-भिन्न संख्या मानना, यह उस-उस शास्त्रकार के विषयानुरूप है | सारे प्रमाणों का अन्तर्भाव करके तीन प्रमाण अवशिष्ट रहते हैं - प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द |

इन तीन प्रमाणों की लापिका *** कर ईश्वरसिद्धि-विषयक प्रयत्न करते समय प्रत्यक्ष की लापिका करने से पूर्व अनुमान की लापिका करनी चाहिए, क्योंकि प्रत्यक्ष का ज्ञान बहुत ही संकुचित और क्षुद्र है | एक व्यक्ति के इन्द्रिय द्वारा कितना ज्ञान हो सकता है ? अर्थात बहुत ही थोड़ा हो सकता है | इसमें प्रत्यक्ष को एक ओर रखकर शास्त्रीय विषयों में अनुमान प्रमाण ही विशेष गिना गया है | व्यवहार के लिए अनुमान आवश्यक है | अनुमान के बिना भविष्य के व्यवहारों के विषय में हमारा जो द्दृड़ निश्चय रहता है, वह निरर्थक होगा | कल सूर्य उदय होगा, यह प्रत्यक्ष नहीं तथापि इस विषय में किसी के मन में तिलमात्र की भी शङ्का नहीं होती | अब [इस] अनुमान के तीन प्रकार हैं - शेषवत्, पूर्ववत् और सामान्यतोदृष्टम् | पूर्व‌वत् अर्थात् कारण से कार्य का अनुमान, शेषवत् अर्थात् कार्य से कारण का अनुमान, सामान्यतोद्रष्टम् अर्थात् संसार में जिस प्रकार की व्यवस्था दिखाई देती है उस पर से जो अनुमान होता है, वह |

इन तीनों अनुमानों की लापिका करने से ईश्वर=परम पुरुष=सनातन ब्रह्म सब पदार्थों का बीज [है] ऐसा सिद्ध होता है | रचनारूपी कार्य दीखता है, इस पर से अनुमान होता है कि इस सृष्टि को रचने वाला अवश्य है | पञ्चभूतों की सृष्टि आप ही आप रची हुई नहीं है, क्योंकि व्यवहार में घर का सामान विद्यमान् होने ही से केवल घर नहीं बन जाता, यह हमारा देखा हुआ अनुमान सर्वत्र है | साथ ही साथ [पञ्चभूतों का] 'मिश्रण' नियमित प्रमाण से विशिष्ट कार्य उत्पन्न होने की ही सुगमता के लिए कभी भी आप स्वयं घटित नहीं होता | इससे स्पष्ट है कि सृष्‍टि की व्यवस्था जो हम देखते हैं, उसका उत्पादक और नियन्ता ऐसा कोई श्रेष्ठ पुरुष अवश्य होना चाहिए |

अब किसी को यह अपेक्षा लगे कि ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्ष ही प्रमाण होना चाहिए, तो उसक विचार यूं है कि प्रत्यक्ष रीति से गुण का ज्ञान होता है | गुण का अधिकरण जो गुणी द्रव्य है उसका ज्ञान प्रत्यक्ष रीति से नहीं होता | इसी प्रकार ईश्वर-सम्बन्धी गुण का ज्ञान चेतन और अचेतन सृष्टि द्वारा प्रत्यक्ष होता है | इसी पर से ईश्वर-सम्बन्धी गुण का अधिकरण जो ईश्वर है, उसका ज्ञान होता है, ऐसा समझना चाहिए |

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् |
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ||
[ऋ. 10|121|1||]

हिरण्यगर्भ का अर्थ शालिग्राम की बटिया नहीं है, किन्तु हिरण्य अर्थात् "ज्योति जिसके उदर में है, वह ज्योतिरूप परमात्मा" ऐसा अर्थ है | मूर्तिपूजा का पागलपन लोगों में फैला हुआ है | इसका क्या उपाय करना चाहिए ? यह एक प्रकार की जबर्दस्ती है | मूर्ति का आडम्बर जैनियों से हिन्दुओं ने लिया है |

यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमा^ परमात्मा^^ ||
वह अमृत है और वही सबके उपासना करने योग्य है | उससे जो भिन्न है वह सब झूठा है वह अपना आधार [मान्य] नहीं है |
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* सहस्त्रशीर्षा सूक्त. ऋ. 10|90, यजुः अ. 31||
**यजु: 31|18||
*** 'लापिका' मराठी शब्द है, इसका अर्थ है ..आलाप = विचार |
^ छा. उ. 7|24|1||
^^ 'परमात्मा' पद व्याख्यानरूप अथवा अध्याहृत है |

*****ओउम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||*****