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महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' तृत्तीयः विभूतिपादः (2)पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1358 जब धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एक ही विषय में उपस्थित किये जाते हैं तो वह संयम कहलाता है | यह संयम की शास्त्रीय परिभाषा है | अर्थात् आगे जहाँ जहाँ सूत्रों व भाष्य में कहा जायेगा कि अमुक विषय में संयम करने से अमुक-अमुक लाभ होता है वहाँ वहाँ संयम का अर्थ होगा कि उस-उस विषय में धारणा-ध्यान-और समाधि तीनों लगाने से वह लाभ होता है | जिस वस्तु में धारणा की जाये उसी वस्तु का ध्यान किया जाये और उसी वस्तु में समाधि लागायी जाये | यदि शरीर के किसी अंगविशेष में धारणा की जाये और ध्यान किसी अन्य वस्तु का किया जाये तो संयम नहीं कहलायेगा | तज्जयात् प्रज्ञाSSलोकः ||5|| [तत्-जयात्] उस संयम पर विजय प्राप्त कर लेने से [प्रज्ञाSSलोकः] समाधिबुद्धि का विकास होता है | उस संयम का उत्कृष्ट अभ्यास करके उस पर अधिकार कर लेने से समाधिबुद्धि विकसित होती है, अर्थात् समाधि में प्राप्त हुए ज्ञान की दृढ़ता, स्पष्टता और निर्मलता होती है | (अब गतांक से आगे) तस्य भूमिषु विनियोगः ||6|| [तस्य] उस संयम का [भूमिषु](आगे की ऊँची) अवस्थाओं में [विनियोगः] प्रयोग करना चाहिए | योग की नीची अवस्थाओं में संयम (= धारणा, ध्यान और समाधि) का दृड़ अभ्यास करके, उसको जीत कर, योग कि ऊँची अवस्थाओं को जीतने (प्राप्त करने) के लिए प्रयोग करना चाहिए | यहाँ सूत्र में भूमियों=अवस्थाओं से तात्पर्य वितर्क, विचार आदि सम्प्रज्ञात समाधियों से है, जिनका वर्णन योगदर्शन के प्रथम पाद में आ चुका है | त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ||7|| [त्रयम्] (धारणा, ध्यान और समाधि ये) तीनों [अन्तरङ्गम्] निकट साधन है [पूर्वेभ्यः] योग के पहले पाँच अंगों की अपेक्षा से | तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ||8|| [तद् - अपि] वह (अन्तरंग साधन) भी [बहिरङ्गम्] दूरस्थ (साधन माना जाता) है [निर्बीजस्य] असंप्रज्ञात समाधि का | सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति के लिए बताये गये अन्तरंग साधन (धारणा, ध्यान और समाधि) असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति कराने में बहिरङ्ग=दूर के साधन होते हैं | असम्प्रज्ञात समाधि का अन्तरङ्ग (=समीप का) साधन तो पर वैराग्य है | व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ||9|| [व्युत्थान-निरोध-संस्कारयोः] व्युत्थान और निरोध संस्कारों का (क्रमशः) [अभिभवप्रादुर्भावौ] दबना और उभरना [निरोधक्षणचित्तान्वयः] निरोधक्षण (काल) से चित्त का युक्त रहना [निरोधपरिणामः] चित्त का निरोध परिणाम है | व्युत्थान-संस्कार का रुक जाना अर्थात् वृत्तियों का न उठना तथा निरोध संस्कार (=असम्प्रज्ञात समाधि) का आरंभ हो जाना चित्त का निरोध-परिणाम है | इस अवस्था में चित्त निरोध के संस्कारों से युक्त रहता है और जितने काल तक यह अवस्था बनी रहती है, उतने काल तक चित्त का निरोध परिणाम कहलाता है | तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ||10|| [तस्य] उस निरुद्धचित्त की [प्रशान्तवाहिता] लगातार शान्तस्वरूप स्थिति (बनी रहती है ) [संस्कारात्] निरोधसंस्कारों के प्रभाव से | निरोध संस्कारों की दृढ़ता=प्रबलता कै कारण, उस निरुद्धचित्त की लगातार शान्त स्थिति बनी रहती है | जब व्युत्थान संस्कार उभरते हैं तब चित्त की वह शान्त स्थिति भंग हो जाती है (और तब चित्त का व्युत्थान परिणाम कहलाता है)| सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ||11|| [सर्वार्थता-एकाग्रतयोः] सर्वार्थता और एकाग्रता का (क्रमशः) [क्षय-उदयौ] दबना और उभरना (जब होता है तब) [चित्तस्य] चित्त का [समाधि-परिणामः] समाधि परिणाम कहलाता है | जब चित्त में अनेक विषय उठने बंद हो जाते हैं और कोई एक विषय ही चित्त में उपस्थित रहता है, तब उस काल में चित्त की जो अवस्था होती है, उसे चित्त का 'समाधि-परिणाम' कहते हैं | यह सम्प्रज्ञात समाधि की प्रारंभिक अवस्था है | (क्रमशः) [सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
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