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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (28)

घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह | अग्ने त्वं रक्षस्विनः ||5||
ऋग्वेदः 1|12|5||

पदार्थ -

घृताहवन................जिसमें घी तथा जल क्रिया सिद्ध होने के लिये छोड़ा जाता और जो अपने
दीदिवः...................शुभ गुणों से पदार्थों को प्रकाश करने वाला है,
त्वम्.....................वह
अग्ने.....................अग्नि
रक्षस्विनः................जिन समूहों में राक्षस अर्थात् दुष्‍टस्वभाववाले और निन्दा के भरे हुए मनुष्य विद्यमान हैं, तथा जो कि
रिषतः....................हिंसा के हेतु दोष और शत्रु है उनका
प्रति वह स्मः............अनेक प्रकार से विनाश करता है, हम लोगों को चाहिये कि उस अग्नि को कार्यों में नित्य संयुक्‍त करें ||5||

भावार्थ -

जो अग्नि इस प्रकार सुगन्ध्यादि गुणवाले पदार्थों से संयुक्त होकर सब दुर्गन्ध आदि दोषों को निवारण‌ करके सब के लिये सुखदायक होता है, वह अच्छे प्रकार काम में लाना चाहिये | ईश्‍वर का यह कथन सब मनुष्यों को मानना उचित है ||5|

अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृह‌पतिर्युवा | हव्यवाडू जुह्वास्यः ||6||
ऋग्वेदः 1|12|6||

पदार्थ -

मनुष्यों को उचित है कि जो
जुह्वास्यः.................जिसका सुख ज्वाला तेज और
कविः.....................क्रान्तदर्शन अर्थात् जिसमें स्थिरता के साथ दृष्‍टि नहीं पड़ती, तथा जो
युवा......................पदार्थों के साथ मिलने और उनको पृथक पृथक करने
हव्यवाट्.................होम‌ किये पदार्थों को देशान्तरों में पहुँचाने और
गृहपति..................स्थान तथा उनमें रहने वालों का पालन करने वाला है, उससे
अग्निः...................यह प्रत्यक्ष रूपवान पदार्थों को जलाने, पृथिवी और सूर्य्यलोक में ठहरनेवाला अग्नि
अग्निना.................बिजुली से
समिध्यते................अच्छी प्रकार प्रकाशित होता है, वह बहुत कामों को सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ||6||

भावार्थ -

जो यह सब पदार्थों में मिला हुआ विद्युद्‍रूप अग्नि कहाता है, उसी से प्रत्यक्ष यह सूर्य्यलोक और भौतिक अग्नि प्रकाशित होते हैं, और फिर जिसमें छिपे हुए विद्‍युद्‍रूप हो के रहते हैं, जो इनके गुण और विद्या को ग्रहण करके मनुष्य लोग उपकार करें, तो उनसे अनेक व्यवहार सिद्ध होकर उनको अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होती है, यह जगदीश्‍वर का वचन है ||6||

कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे | देवममीवचातनम् ||7||
ऋग्वेद 1|12|7||

पदार्थ -

हे मनुष्य ! तू
अध्वरे..................उपासना करने योग्य व्यवहार में
सत्यधर्माणम्...........जिसके धर्म नित्य और सनातन हैं, जो
अमीवचातनम्..........अज्ञान आदि दोषों का विनाश करने तथा
कविम्..................सबकी बुद्धियों को अपने सर्वज्ञपन से प्राप्त होकर
देवम्...................सब सुखों का देनेवाला
अग्निम्................सर्वज्ञ ईश्‍वर है, उसको
उपस्तुहि...............मनुष्यों के समीप प्रकाशित कर ||1||

हे मनुष्य ! तू
अध्वरे..................करने योग्य यज्ञ में
सत्यधर्माणम्...........जो कि अविनाशी गुण और‌
अमीवचातनम्..........ज्वरादि रोगों का विनाश करने तथा
कविम्..................सब स्थूल पदार्थों को दिखानेवाला और‌
देवम्...................सब सुखों का दाता
अग्निम्................भौतिक अग्नि है, उसको
उपस्तुहि...............सब के समीप सदा प्रकाशित करें ||2||7||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | मनुष्यों को सत्यविद्या से धर्म की प्राप्ति तथा शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये ईश्‍वर और भौतिक अग्नि के गुण अलग अलग प्रकाशित करने चाहिये | जिससे प्राणियों को रोग आदि के विनाश पूर्वक सब सुखों की प्राप्ति यथावत् हो ||7||

यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्य्यति | तस्य स्म प्राविता भव ||8||
ऋग्वेद 1|12|8||

पदार्थ -
हे
देव......................सबके प्रकाश करनेवाले
अग्ने....................विज्ञानस्वरूप जगदीश्‍वर ! जो मनुष्य
हविष्‍पतिः...............देने लेने योग्य वस्तुओं का पालन करनेवाला
यः.......................जो मनुष्य
दूतम्....................ज्ञान देनेवाले आपका
सपर्य्यति...............सेवन करता है
तस्य....................उस सेवक मनुष्य के आप
प्राविता..................अच्छी प्रकार जाननेवाले
भव.....................हों ||1||

यः.......................जो
हविष्‍पतिः...............देने लेने योग्य पदार्थों की रक्षा करनेवाला मनुष्य‌
देव......................प्रकाश और दाहगुणवाले
अग्ने....................भौतिक अग्नि का
सपर्य्यति...............सेवन करता है
तस्य....................उस मनुष्य का वह अग्नि
प्राविता..................नाना प्रकार के सुखों से रक्षा करनेवाला
भव.....................होता है ||2||8||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है | दूत शब्द का अर्थ दो पक्ष में समझना चाहिये, अर्थात् एक इस प्रकार कि सब मनुष्यों में ज्ञान का पहुँचाना ईश्‍वर पक्ष, तथा एक देश से दूसरे देश में पदार्थों का पहुंचाना भौतिक पक्ष में ग्रहण किया गया है | जो आस्तिक अर्थात् ईश्‍वर में विश्‍वास रखने वाले मनुष्य अपने ह्रदय में सर्वसाक्षी का ध्यान करते हैं, वे पुरुष ईश्‍वर से रक्षा को प्राप्त होकर पापों से बचकर धर्मात्मा हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होते हैं, तथा जो युक्ति से विमान आदि रथों में भौतिक अग्नि को संयुक्त करते हैं, वे भी युद्धादिकों में रक्षा को प्राप्त होकर औरों की रक्षा करनेवाले होते हैं ||8||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (27)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)
पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1367