Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः, (अथ द्वितीयः प्रकाशः) (4)

***ओउम्***

स्तुति विषय‌

तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः |
तदेव शुक्रं तद्‍ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ||4||
यजु . 32|1||

व्याख्यान -

जो सब जगत का कारण एक परमेश्‍वर है उसीका नाम अग्नि है | (ब्रह्म ह्यग्निः शतपथे) सर्वोत्तम ज्ञानस्वरूप जानने के योग्य, प्रापणीयस्वरूप और पूज्यतमेत्यादि अग्नि शब्द का अर्थ है | "आदित्यो वै ब्रह्म, वायुर्वै ब्रह्म, चन्द्रमा वै ब्रह्म, शुक्रं हि ब्रह्म, सर्वजगत्कर्तृ ब्रह्म, ब्रह्म वै बृहत्, आपौ वै ब्रह्मेत्यादि" शतपथ तथा ऐतरेय ब्राह्मण के प्रमाण हैं "तादित्यः" जिसका कभी नाश न हो, और स्वप्रकाशस्वरूप हो, इससे परमात्मा का नाम आदित्य है | "तद्वायुः" सब जगत् का धारण करने वाला, अनन्त बलवान् प्राणों से भी जो प्रियस्वरूप है, इससे ईश्‍व‌र का नाम वायु है | पूर्वोक्त प्रमाण से "तदुचन्द्रमाः" जो आनन्दस्वरूप और स्वसेवकों को परमानन्द देने वाला है | इससे पूर्वोक्त प्रकार से चन्द्रमा परमात्मा को जानना | "तदेव शुक्रम्" वही चेतन स्वरूप ब्रह्म सब जगत् का कर्त्ता है "तद्‍ब्रह्म" सो अनन्त चेतन सबसे बड़ा है, और धर्मात्मा स्वभक्तों को अत्यन्त सुख विद्यादि सद्‍गुणों से बढ़ाने वाला है | "ता आपः" उसी को सर्वज्ञ चेतन सर्वत्र व्याप्त होने से आप नामक जानना | "सः प्रजापतिः" सो ही सब जगत् का पति (स्वामी) और पालन करने वाला है, अन्य कोई नहीं | उसी को हम लोग इष्‍टदेव तथा पालक मानें अन्य को नहीं ||4||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'
पूर्व संदर्भ -
http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1389