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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वैदिक भक्ति विज्ञान - क्या कहा स्वामी विवेकानन्दजी परिव्राजक ने ?

भरूच में स्वामी विवेकानंद परिव्राजक द्वारा "वैदिक भक्ति विज्ञान" पर दिये गये प्रवचनों के अंश -

दि. २७ और २८ दिसम्बर दो दिन आर्य समाज भरूच (गुजरात) द्वारा आयोजित "वैदिक भक्ति विज्ञान" प्रवचनमाला में वेद में ईश्वर का कैसा स्वरूप वर्णित किया गया है तथा उसमें ईश्वर-प्राप्ति, भक्ति या योग साधना का कैसा सरल-सुगम मार्ग बताया गया है – इस सम्बन्ध में जिज्ञासु लोगों का मार्गदर्शन कर उनकी विभिन्न धर्म-अध्यात्म विषयक शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए दर्शन योग महाविद्यालय रोजड से पधारे सुविख्यात दार्शनिक उपदेशक स्वामी श्री विवेकानंदजी परिव्राजक ने अपनी लाक्षणिक व तार्किक शैली में कहा कि संसार के भौतिक पदार्थों में सुख तो है, परंतु उन सुखों में अनेक प्रकार के दुःख भी मिश्रित रहते हैं । अतः उनसे मनुष्य कभी भी तृप्त नहीं हो सकता है । जब कि परमात्मा की ओर से मिलने वाला सुख या आनंद विशुद्ध होता है । उसमें किसी भी प्रकार का कोई दुःख नहीं होता है । इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति को संसार की वस्तुओं में से मिलने वाले अल्प सुखों के पीछे न दौडकर ईश्वर के स्थायी सुख तथा मोक्ष को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए । इसी में बुद्धिमत्ता है । इस संसार का विवेक पूर्वक उपयोग कर, सकाम कर्मों के स्थान पर निष्काम कर्मों को करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के लिए निरंतर यत्न करते रहना चाहिए । संपूर्ण दुःखों से छुटकर, ईश्वर के नित्य आनंद को प्राप्त करना और समस्त ब्रह्मांड में किसी भी प्रकार की कोई भी रोकटोक के बिना - निर्बाध विचरना यही तो मोक्ष है । मोक्ष प्राप्त करना ही कल्याणकारी मार्ग है । बुद्धिमान् विवेकी व्यक्ति के लिए जीवन का मुख्य प्रयोजन अन्य कोई हो ही नहीं सकता ।

पूज्य स्वामीजी ने अपने प्रवचन में आगे कहा कि वेद के अनुसार की जाने वाली ईश्वर की उपासना को ही 'वैदिक भक्ति' कहा जा सकता है । वेद में कहा है कि ईश्वर एक है, अनेक नहीं । वह सर्वव्यापक है, सर्वत्र विद्यमान है । अतः वह निराकार है, उसका कोई रूप-रंग नहीं है । और न ही वह कभी कोई आकार या शरीर धारण करता है । ईश्वर न्यायकारी है । वह अन्याय कभी भी नहीं करता है । हमारे समस्त कर्मों का यथायोग्य फल देता है । वह हमारे द्वारा किये गए पाप कर्मो का अवश्य दण्ड देता है, क्षमा कुछ भी नहीं करता है । इसलिए कर्म करने में हमें सदैव सतर्क-सावधान रहना चाहिए । ईश्वर आनंद स्वरूप है । उसमें अनंत आनंद है । वह अपने सुपात्र उपासकों को न्यायपूर्वक आनंद प्रदान करता है । इसलिए ईश्वर के इस प्रकार के वेदोक्त सत्य स्वरूप को अपनी बुद्धि में उपस्थित कर जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातः-सायं एकांत स्थान में बैठ कर, आंखें बन्द कर १५-२० मिनट ईश्वर के ऐसे वास्तविक गुणों का चिंतन-मनन या ध्यान करता है, उसका आत्मिक विकास अवश्य होता है । ईश्वर का यथार्थ स्वरूप वेदों में वर्णित किया गया है । उसे ठीक प्रकार से जानकर हमें अपने व्यवहार को भी शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए । अपने दैनिक व्यवहार में हमें सत्य, अहिंसा, संयम आदि यम-नियमों का पालन अवश्य ही करना चाहिए । उपासना में सफलता तभी मिलती है जब ये दोनों कार्य किये जाय – व्यवहार में दोष न आने देना और ईश्वर का योगाभ्यास पूर्वक ध्यान करना ।

अपने प्रवचन में स्वामीजी ने आगे यह भी बताया कि विद्या ही परम तीर्थ है । क्योंकि जिसके माध्यम से हम अपने दुःखों से पार हो जाते हैं, तर जाते हैं, वही वास्तविक तीर्थ है । विद्या से हम दुःखों का निवारण करने में समर्थ हो जाते हैं । विद्या की सहायता से ही हम दुःखों व क्लेशों से मुक्त हो सकते हैं । विद्या को इसीलिए सर्वोत्तम तीर्थ समझना चाहिए । विद्या का अर्थ है – यथार्थ ज्ञान अथवा तत्त्वज्ञान । केवल शाब्दिक ज्ञान को विद्या नहीं कहा जा सकता । जो पदार्थ जेसा है, उसे वैसा ही समझना, मानना, बोलना-लिखना, और उस के साथ ऐसा ही सम्यक् व्यवहार करना, उसी का नाम है – विद्या । जिस व्यक्ति को ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति – ये तीन अनादि पदार्थों के विषय में विशुद्ध ज्ञान होता है, उसके कर्म तथा उपासना (भक्ति) भी विशुद्ध होते हैं । और जिसको इन पदार्थों का अशुद्ध ज्ञान होता है, उसके कर्म-उपासना भी अशुद्ध होते हैं । नदियों या तथाकथित तीर्थ स्थानों में स्नान करने से शरीर तो शुद्ध हो सकता है, मगर जल में व्यक्ति के पापों को धोने का सामर्थ्य बिलकुल ही नहीं होता है । इसलिए इन तथाकथित तीर्थों में स्नान करने से हमारे पाप दूर हो जायेंगे ऐसा मानना अविद्या है । किये हुए पाप कर्मों का दंड तो अवश्य भोगना ही है । ईश्वरीय न्याय व्यवस्था अटल है । वेदों का अर्थ सहित अध्ययन करने से, विद्वानों का संग करने से तथा चिंतन-मनन-स्वाध्याय करने से ही विद्या की प्राप्ति होती है ।

अपने प्रवचन में स्वामीजी ने फलित ज्योतिष संबंधित हस्तरेखा, जन्मपत्रिका, नवग्रहपूजा, मूर्तिपूजा, भूतप्रेत आदि मिथ्या विश्वासों की भी तार्किक आलोचना की और धर्म तथा अध्यात्म के क्षेत्र में प्रचलित अनेक पाखंडों तथा भ्रमणाओं से मुक्त होने की श्रोता जनों से मार्मिक अपील की । उन्होंने बताया कि परमात्मा का मुख्य नाम 'ओम्' है । उन्होंने 'ओम् आनंदः' तथा 'ओम् न्यायकारी' आदि शब्द-समूह तथा गायत्री मंत्र के जाप के माध्यम से श्रोताओं को ध्यान का क्रियात्मक दिग्दर्शन भी कराया । स्वामीजी ने मंगलवार को यहां के एक विद्यालय के छात्रों व शिक्षकगण समक्ष दिये गये अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मन-बुद्धि के विकास का मार्ग बताया और छात्रों के द्वारा पूछे गये अनेक प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर भी दिये । कार्यक्रम के दौरान भरूच आर्य समाज की ओर से वैदिक साहित्य वितरित किया गया ।

(नोट - यह संकलन मैने मेरी स्मृति के आधार पर लिखा है । मूल वक्ता के भाव को जैसा मैने समझा वैसा प्रस्तुत करने का प्रयास किया है । कोई त्रुटि या भूल हो तो मुझे क्षमा करें - भावेश मेरजा)

अत्यन्त

अत्यन्त लाभकारी व सुरुचिपूर्ण ! आदरणीय भावेश जी ऐसे 2 लेख कृपया निरन्तर लिखते रहें | इससे बहुत लाभ, व आत्म तृप्ति होती है | पूज्य‌नीय स्वामी जी के भाषण तो वैसे भी बहुत आकर्षक होते हैं |
बहुत बहुत धन्यवाद |

आनन्द‌