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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

व्रत रहितों को व्रतसहित करना

ओउम् | सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि |
अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि ||

ओउम् | अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत |
मम वशेषु ह्रदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत ||
अथर्ववेद 6|94|1,2||
शब्दार्थ -

वः.....................तुम्हारे
मनांसि...............मनों को
सं+नमामसि........एकसमान हम झुकाते हैं | तुम्हारे
व्रता..................व्रतों को
सम्..................एकसमान झुकाते हैं | तुम्हारे
आकूतीः...............संकल्पों को
सम्..................एकसमान झुकाते हैं |
अभी.................ये
ये......................जो तुम
विव्रताः................व्रतरहित
स्थन..................हो,
ताऩ्...................उन
वः......................आपको हम
सं+नमयामसि.......एकसमान झुकवाते हैं |
अहम्.................मैं
मनसा................अपने मन से
मनांसि................तुम्हारे मनों को
गृभ्णामि..............पकड़ता हूँ, लेता हूँ, ग्रहण करता हूँ |
चित्तेभिः................अपने चित्तों से
मम....................मेरे
चित्तम्+अनु.........चित्त के अनुकूल
एत....................चलो | मैं
वः......................तुम्हारे
ह्रदयानि...............ह्रदयों को
मम....................मेरे अपने
वशेषु..................वश में
कृणोमि................करता हूँ |
मम....................मेरे
यातम्.................मार्ग के
अनुवर्त्मानः..........अनुकूल मार्ग वाले होकर
एत....................चलो |

व्याख्या -

आचार्य्य शिष्यों का उपनयन करते हुए कहते हैं - सं वो मनांसि....| आचार्य्य का कर्त्तव्य है कि उपनीत शिष्यों के मनों को संमन=उत्तम मन वाला बनावे | वे बालक हैं उन्हें अपने ध्येय का ज्ञान नहीं है, ज्ञान हो भी तो पूरा आभास नहीं होता | आचार्य्य का कर्त्तव्य है कि शिष्य की रुचि, प्रवृति आदि देखकर उसके व्रत=संव्रत का निश्चय करे और शिष्य को उस‌के अनुकूल चलाये | मन के परिष्कार के लिए संकल्प का सुधार सबसे मुख्य है | मनोविज्ञान-शास्त्र के प्रकाण्ड पाण्डित्य के बिना यह कार्य्य नहीं हो सकता | मनोविज्ञान के महाविद्वान् आचार्य्य का कार्य्य है कि वह शिष्य की मनोंवृत्तियों के आधार से उनके संकल्पों को जाने और उनको उद्विग्न किये बिना उनका सुधार कर दे | निस्सन्देह यह कार्य्य अत्यन्त कठिन है, किन्तु आचार्य्य का आचार्य्यपन भी इसी में है | यास्काचार्य्य ने कहा है - आचार्य्यः कस्मात् ? आचारं ग्राहयति (निरु.) आचार ग्रहण कराने के कारण आचार्य्य आचार्य्य है | आचार का ग्रहण कराना संकल्प-सुधार के बिना असम्भव है, अतः आचार्य्य कहता है - अमी ये विव्रता स्थन.....| ये जो तुम व्रतरहित हो, उनको व्रत के लिए झुकाता हूँ | जब सामने व्रत=लक्ष्य न हो, उनके लिए संकल्प बन नहीं सकता | व्रत का निश्चय होने पर ही मन और संकल्प को उसके अनुकूल करना आचार्य्य का कार्य्य है अर्थात् वह आचार्य्य के अधिकार में है कि वह शिष्य को जैसा चाहे बना दे |इसी कारण कदाचित् महर्षि मनु (2|148) ने लिखा है ..

आचार्य्यस्त्व‌स्य यां जातिं विधिवद् वेदपारगः |
उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या साजरामरा ||

वेदज्ञ आचार्य्य वेदाध्ययन द्वारा अपने शिष्य का जो वर्ण बनाता है, वही सच्चा है, वही अजरामर है |
इस मन्त्र के पूर्वार्ध का एक अर्थ यह भी है कि 'तुम्हारे मनों, व्रतों और संकल्पों के अनुकूल हम झुकते हैं |' अर्थात् आचार्य्य शिष्यों को कह रहे हैं, हम ऊपर से नीचे आएँगे और तुम्हारे मनों, व्रतों एवं संकल्पों को जानकर तुम्हें ऊपर उठायेँगे | आचार्य्यों की यह‌ उक्ति महत्त्वपूर्ण है | जबतक संसार के आचार्य्य इस वैदिक वाग् के अनुसार व्यवहार करते रहे, संसार में श्रेष्ठ मनुष्यों का बाहुल्य रहा | आचार्य्यों की इस सद्भावना को उत्तरार्ध में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है | अगले मन्त्र में आचार्य्य शिष्यों को अपना अनुकरण करने का उपदेश कर रहा है | पारस्कर गृह्यसूत्र में इसी मन्त्र का अनुवाद् कर इसे गुरु-शिष्य की पारस्परिक प्रतिज्ञा का रूप दे दिया गया है -

मम व्रते ते ह्रदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु |
मम वाचमेकमना जुषस्व वृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ||

मैं अपने लक्ष्य में तेरे ह्रदय को लगाता हूँ तथा तेरे व्रत में अपने ह्रदय को लगाता हूँ | मेरा चित्त तेरे चित्त के अनुकूल हो, तेरा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल हो | मेरी बात सावधान होकर सुन | भगवान् ने तुझे मेरे लिए किया है |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय सन्दोह से साभार प्रेषित)