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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

पुनर्जन्म की सिद्धि

वानप्रस्थ साधक आश्रम और दर्शन योग महाविद्यालय - रोजड (साबरकांठा - गुजरात, www.darshanyog.org) के दार्शनिक विद्वान् स्वामी श्री विवेकानंद जी परिव्राजक आवागमन अथवा पुनर्जन्म की सिद्धि के लिए श्रोताओं से प्रायः निम्न प्रश्नोत्तर करते हैं -

प्रश्न - आप किस बात को न्याय संगत मानते हैं – पहले कर्म किया जाय और फल बाद में दिया जाय, या पहले फल दिया जाए और कर्म बाद में किया जाय ?
उत्तर - पहले कर्म किया जाय और फल बाद में दिया जाय, यही न्याय संगत है |
प्रश्न - अच्छा ! अब यह बताइयें कि आपको पैदा होते ही जो यह शरीर मिला है, वह बिलकुल मुफ्त में मिला है, या किन्हीं कर्मों का फल है ?
उत्तर - मुफ्त में नहीं मिला है, बल्कि किन्हीं कर्मों का फल है |
प्रश्न - ठीक है ! अब मेरा अंतिम व तीसरा प्रश्न यह है कि - प्रथम आपने यह स्वीकार किया कि "पहले कर्म किया जाय और फल बाद में दिया जाय यही न्याय संगत है", और फिर यह कहा कि "यह शरीर मुफ्त में नहीं मिला, किन्हीं कर्मों का फल है" – तो कृपया अब यह बताइयें कि जिन कर्मों का फल यह शरीर है, वे कर्म आपने कब किये ?
उत्तर - पूर्व जन्म में !
तो पुनर्जन्म की सिद्धि हो ही गई |
= भावेश मेरजा