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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'उपासना विषयः' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से (6)

पूर्व संदर्भ - http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1392

इसलिये (तज्जप.) इसी नाम का जप अर्थात् स्मरण और उसी का अर्थविचार सदा करना चाहिये कि जिससे उपासक का मन एकाग्रता, प्रसन्नता और ज्ञान को यथावत् प्राप्त होकर स्थिर हो | जिससे उसके ह्रदय में परमात्मा का प्रकाश और परमेश्वर की प्रेम-भक्ति सदा बढ़ती जाय ||17||

(अब गतांक से आगे)

फिर उससे उपासकों को यह भी फल होता है कि
....
भाषार्थ -

इस मनुष्य को क्या होता है ? (ततः प्र.) अर्थात् उस अन्तर्यामी परमात्मा की प्राप्ति, और (अन्तराय) उसके अविद्यादि क्लेशों तथा रोगरूप विघ्नों का नाश हो जाता है ||18||

वे विघ्न‌ नव प्रकार के हैं (व्याधि) एक व्याधि अर्थात् धातुओं की विषमता से ज्वर आदि पीड़ा का होना | (दूसरा) (स्त्यान) अर्थात् सत्य कर्मों में अप्रीति | (तीसरा) (संशय) अर्थात् जिस पदार्थ का निश्चय किया चाहे, उसका यथावत् ज्ञान न होना |(चौथा) (प्रमाद) अर्थात् समाधिसाधनों के ग्रहण में प्रीति और उनका विचार यथावत् न होना | (पांचवां) (आलस्य) अर्थात् शरीर और मन में आराम की इच्छा से पुरुषार्थ छोड़ बैठना (छठा) (अविरति) अर्थात् विषय सेवा में तृष्णा का होना (सातवां) (भ्रान्तिदर्शन) अर्थात् उलटे ज्ञान का होना, जैसे जड़ में चेतन और चेतन में जड़बुद्धि करना तथा ईश्वर में अनीश्वर और अनीश्वर में ईश्वर भाव करके पूजा करना | (आठवां) (अलब्धभूमिकत्व) अर्थात् समाधि की प्राप्ति न होना और (नववां) (अनवस्शितत्व) अर्थात् समाधि की प्राप्ति होने पर भी उसमें चित्त स्थिर न होना | ये सब चित्त की समाधि होनें में विक्षेप अर्थात् उपासनायोग के शत्रु हैं ||19||

अब इनके फल लिखते हैं - (दुःखदौर्न.) अर्थात् दुःख की प्राप्ति, मन का दुष्ट होना, शरीर के अवयवों का कंपना, श्वास और प्रश्वास के अत्यन्त वेग से चलने में अनेक प्रकार के क्लेशों का होना, जो कि चित्त को विक्षिप्त कर देते हैं | ये सब क्लेश अशान्त चित्त वाले को प्राप्त होते हैं, शान्त चित्तवाले को नहीं ||20||

और उनके छुड़ाने का मुख्य उपाय यही है कि - (तत्प्रतिषेधा.) जो केवल एक अद्वितीय ब्रह्मतत्व है उसी में प्रेम और सर्वदा उसी की आज्ञापालन में पुरुषार्थ करना है, वही एक उन विघ्नों के नाश करने का वज्ररूप अस्त्र है , अन्य कोई नहीं | इसलिये सब मनुष्यों को अच्छी प्रकार प्रेमभाव से परमेश्वर के उपासनायोग में नित्य पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे वे सब विघ्न दूर हो जायें ||21||

आगे जिस भावना से उपासना करने वाले को व्यवहार में अपने चित्त को प्रसन्न करना होता है सो कहते हैं -

(क्रमशः)

Dhanyavad Ati ati sunder .

Dhanyavad
Ati ati sunder .