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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आइये सीखें कैसे करें स्तुति प्रार्थना उपासना आचार्य सत्यव्रत जी , आर्ष गुरुकुल सुन्दरपुर कुटिया, रोहतक से (2)

*******ओउम्*******

ओउम् भूर्भुवः स्वः | तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो नः प्रचोदयात् || यजु. 26|3||

पूर्व संदर्भ‌ http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1405

भूः

स्तुति -‍ हे प्राणप्रिय बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आप मुझ आत्मा के अन्दर हो ऐसा मैं अनुभव करके प्रत्यक्ष देख रहा हूँ |

प्रार्थना - हे बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मैं आपसे बहुत प्रेम करने लग जाउँ अर्थात् मै उल्टे संस्कारों (आदतों) के वशीभूत होकर न चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से उल्टे अर्थात् व्यर्थ, दोषपूर्ण अव्यवस्थित कार्य कर लेता हूँ और अच्छे संस्कारों की न्यूनतावश चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से अच्छे अर्थात् आवश्यक, गुणवर्धक, व्यवस्थित कार्य नहीं कर पाता हूँ |

अतः प्रभु ! मुझ आत्मा के अन्दर से उल्टे संस्कारों को समाप्त करके अच्छे संस्कारों को भर दीजिए जिससे प्रभु ! मेरा आपसे बहुत प्रेम हो जाएगा और व्यर्थ, दोषपूर्ण, अव्यवस्थित कार्य करने की प्रवृति दिन-प्रतिदिन घटती ही जाएगी |

उपासना - हे बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आपसे बहुत प्रेम करने के लिए मैं पूर्ण पुरुषार्थ करूँगा | अर्थात् अब तक जो हुआ सो हुआ अब जानबूझकर मन बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित कार्य नहीं करूँगा | ऐसा दृढ़संकल्प लेकर हे प्रभु ! मैं आपके समर्पित हूँ | यदि आलस्य प्रमादवशात् मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जानबूझकर कोई दोष कर भी दिया तो उसका प्रायश्‍चित अवश्य करूँगा |

भुवः

स्तुति - हे सबके सब जगह सब प्रकार के दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आप मुझ आत्मा में विद्यमान हैं ऐसा मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ |

प्रार्थना - हे सबके सब जगह सब प्रकार के दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आप सब जगह मेरे सब प्रकार के दुःखों को दूर कर दीजिए | हे प्रभु ! मै उल्टे संस्कारों के वशीभूत होकर न चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण अव्यवस्थित कार्य कर लेता हूँ और अच्छे संस्कारों की न्यूनतावश चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से आवश्यक, गुणवर्धक, व्यवस्थित कार्य नहीं कर पाता हूँ | अतः हे प्रभु ! आप मुझ आत्मा के अन्दर से उल्टे संस्कारों को समाप्त करके अच्छे संस्कार भर दीजिए जिससे मैं सब जगह सब प्रकार के दुःखों से दूर हो जाउँ |

उपासना - हे सबके सब दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आपकी दुःख दूर करने की कृपा को प्राप्त करने के लिए पूर्ण‌ पुरुषार्थ करूँगा | अर्थात् अब तक जो हुआ सो हुआ अब जानबूझकर मन बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित कार्य नहीं करूँगा | ऐसा दृढ़संकल्प लेकर हे प्रभु ! मैं आपके समर्पित हूँ | यदि आलस्य प्रमादवशात् मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जानबूझकर कोई दोष हो भी ग‌या तो उसका प्रायश्‍चित अवश्य करूँगा |

स्वः

स्तुति - हे सुखस्वरूप, सुख‌दाता, सबको, सब जगह, सब प्रकार के सुखों को देने वाले प्रभु । आप मुझ आत्मा में विद्यमान हैं ऐसा मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ |

प्रार्थना - हे सबको सब प्रकार के सुख देने वाले प्रभु ! आप मुझे सब जगह सब प्रकार के सुखों से पूरित कीजिए | हे प्रभु ! मैं सब सुखों से पूरित हो जाउँ इसके लिए आप मेरे उल्टे संस्कारों को नष्ट करके अच्छे संस्कार मुझ आत्मा में भर दीजिए जिससे मैं मन, बुद्धि, इन्द्रियों से एक भी व्यर्थ, दोषपूर्ण, अव्यवस्थित कार्य नहीं कर सकूँ | सदा आवश्यक, गुणवर्धक, व्यवस्थित कार्य ही करूँ | ऐसा करने पर निस्सन्देह मैं सब सुखों से पूरित हो जाऊँगा |

उपासना - हे सब सुखों से भरे हुए प्रभु ! अब मैं सब जगह सब सुखों को देने की जो आपकी महान् कृपा है उसको प्राप्त करके ही रहूँगा इसके लिए मैं पूर्ण‌ पुरुषार्थ करूंगा | अब तक जो हुआ सो हुआ अब जानबूझकर मन बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित कार्य नहीं करूँगा ऐसा दृढ़संकल्प लेकर हे प्रभु ! मैं आपके समर्पित हूँ | यह समर्पण ही आपकी उपासना है | यदि संस्कारवश अथवा जानबूझकर आलस्य प्रमाद से दोष हो भी ग‌या तो उसका प्रायश्‍चित अवश्य करूँगा |

(क्रमशः)
साभार प्रस्तुति आचार्य सत्यव्रत जी के सौजन्य से

आर्ष गुरुकुल सुन्दरपुर कुटिया, रोहतक - 124001 (हरियाणा)