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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मूर्तिपूजा के समर्थक पाठकों के अवलोकन हेतु श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक

मूर्तिपूजा एवं अवतारवाद के समर्थक जिज्ञासु पाठकों की सेवा में श्रीमद्भागवत पुराण (३-२९-२१,२२) के निम्न श्लोक दृष्टव्य हैं -

अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा ।
तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥

यो मां सर्वषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।
हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भस्मन्येव जुहोति सः ॥

अर्थात् भगवान् कह रहे हैं - मैं संपूर्ण भूतों का अन्तरात्मा हूं और सर्वदा समस्त जीवों में विराजमान हूं । ऐसे मुझ परमात्मा की अवज्ञा करके जो लोग प्रतिमा अर्थात् मूर्तिपूजन करते हैं, उनका वह पूजन ढोंग मात्र है ।

जो मनुष्य संपूर्ण भूतों में स्थित और सबके अन्तरात्मा रूप मुझ ईश्वर की अवहेलना करके मूर्तिपूजा करने में लगा रहता है, वह मानो भस्म में किए हवन के समान व्यर्थ है ।

उक्त श्लोकों में मूर्तिपूजा का खंडन किया गया है । इतना ही नहीं, भागवत पुराण (१०-८४-१३) में मूर्तिपूजकों को "गधे" की उपाधि से सुभूषित किया गया है -

यस्मात्मबुद्धिः कृपणे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥

अर्थात् - जिस पुरुष की वात-पित्त-कफ इन तीन धातुओं से बने हुए शवतुल्य शरीर में आत्मबुद्धि है, जो स्त्री आदि को अपना मानता है, जिसकी मिट्टी - पत्थर की प्रतिमाओं में देवबुद्धि है, वह ज्ञानिओं की दृष्टि में गौओं का चारा ढोनेवाला बैल अथवा गधा है ।

पुराण का एक अन्य श्लोक भी देख लेवें -

तीर्थेषु पशुयज्ञेषु काष्ठपाषाणमृण्मये ।
प्रतिमादौ मनो येषां ते नरा मूढचेतसाः ॥

यहां लक्कड, पत्थर और मिट्टी की मूर्ति में जिनका मन लगा हुआ है, उनको "महामूर्ख" कहा गया है ।

उक्त प्रमाणों पर सम्यक् विचार कर सत्य को ग्रहण कर असत्य को छोडना चाहिए ।

[संदर्भ ग्रंथ - डॉ० सत्यव्रत 'राजेश' रचित "हिन्दूधर्मसूत्र - एक तथ्यात्मक अध्ययन" की स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती लिखित "भूमिका"]

प्रस्तुतकर्ता - भावेश मेरजा

आदरणीय

आदरणीय भावेश जी

इतना स्पष्ट उल्लेख तथा अन्यत्र भी इस प्रकार के उल्लेख के होते हुए जो मूर्तियों की पूजा पर बल देते हैं वे क्या यह स्वार्थवश तो नहीं कर रहे हैं ? साधारण नागरिकों को अब यह समझना होगा | कहीं यह बहुत बड़ा कारोबार तो नहीं बन गया है ? इस काल में जब प्राणायाम आदि के करने से तन में निर्मलता का प्रवाह आरम्भ हो गया है, तब महर्षि प‌तञ्ज‌ली जी के योग को पूर्णतया अपनाया जाना चाहिए | इस प्रकार करने से वृत्तियों के ज्ञान व उनके शमन से तन मन शुद्ध हो जाने पर हमे स्वयं ही यह ज्ञान हो जाएगा कि हम शरीर नही हैं | यह शरीर तब हम, अपने ज्ञान अनुसार अपने भले व‌ अपने उत्थान के लिए प्रयोग में ला सकेंगे | तब हमें किसी भी जड़ वस्तु की भगवान को जानने के लिए प्रयोग करने की आवश्यक्‍ता ही नहीं रहेगी, चूँकि तब हमारे पास होगा यह विलक्षण शरीर रूपी यन्त्र जिसमें हम परमात्मा की भरपूर खोज कर सकेंगे तथा उसे पाने के लिए हमारे पास होगा वेदमन्त्रों का अद्भुत खजाना | आप इसी प्रकार ज्ञान से सभी को अनुग्रहित करते रहें, ऐसी प्रार्थना के साथ

आनन्द‌