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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - द्वितीय वल्ली (5)

पूर्व संदर्भ

अनेक गुणों से भूषित ब्रह्म को जानकर संसार के द्वन्दमय सुख और दुःख दोनों को धीर पुरुष छोड़, और अभ्यास तथा वैराग्य से उस ब्रह्म को प्राप्त कर लिया करता है - यह ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग नचिकेता के लिए खुला हुआ है ऐसा यम समझता है | विषय-भोग सम्बन्धी सांसारिक सुख भी अन्त में दुःख प्राप्ति का हेतु हुआ करता है इसीलिये आत्मज्ञानी दुःख के साथ इस सुख को भी छोड़ दिया करता है |

(अब गतांक से आगे)

अन्यत्र धर्मादन्यत्राSधर्मादन्य‌त्रास्मात्कृताSकृतात् |
अन्यत्र भूताच्च‌ भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ||14||

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपा.सि सर्वाणि च यद्वदन्ति |
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्तं पद. संग्रहेण ब्रवीम्योमि त्येतत् ||15||

एतद्ध् येवाक्षरं ब्रह्म एतद्व येवाक्षरं परम् |
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ||16||

एतदालम्बऩ् श्रेष्ठमेतदालम्बन परम् |
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ||17||

अर्थ -

धर्मात्............कर्त्तव्य रूप आचरण से
अन्यत्र...........पृथक्
अधर्मात्.........अकर्त्तव्य से भी
अन्यत्र...........पृथक्
अस्मात्..........इस
कृत...............कार्य्य
अकृतात्........और कारण से
अन्यत्र...........भिन्न
भूतात्...........बीते काल से
भव्यात्...........आने वाले समय से
च................वर्तमान से भी
अन्यत्र...........अलग
यत्...............जिसको
पश्यसि..........तू देखता है
तत्...............उसको
वद................कह ||14||

सर्वे वेदाः.........चारों वेद
यत्................जिस
प‌दम्..............पद का
आमनन्ति........वर्णन करते हैं
सर्वाणि............सारे
तपांसि च.........तप और नियमादि
यत्................जिस पद का
व‌दन्ति............कथन करते हैं
यत्................जिस पद की
इच्छन्तः..........इच्छा करते हुए
ब्रह्मचर्यम्.........ब्रह्मचर्य के नियमों का
चरन्ति............आचरण करते हैं
तत्................उस
पदम्..............पद को
ते..................तेरे [नचिकेता के] लिए
संग्रहेण...........संक्षेप से
ओम्...............ओउम्
इति................है
एतत्..............यह
ब्रवीमि............कहता हूं ||15||

हि................निश्च‌य
एतत्.............यह [ओउम्]
एव...............ही
अक्षरम्...........नाश न होने वाला
ब्रह्म...............ब्रह्म है
एतत्.............यह
एव................ही
परम्..............सर्वश्रेष्ठ
अक्षरम्............अक्षर है
एतत्, हि, एव.....निश्चय इन ही
अक्षरम्............अविनाशी ब्रह्म को
ज्ञात्वा.............जानकर
यः.................जो कोई
यत्................जिस विषय को
इच्छति............चाहता है
तस्य...............उसको
तत्.................वह प्राप्त हो जाता है | ||16||

एतत्...............यह
आलम्बऩम्........आश्रय
श्रेष्ठम्...............श्रेष्ठ है
एतत्...............यह
आलम्बऩम्........आश्रय
परम्...............सर्वोपरि है
एतत्...............इस
आलम्बनम्........आलम्बन को
ज्ञात्वा..............जानकर
ब्रह्मलोके............ब्रह्मलोक में
महीयते.............आनन्दित होता है ||17||

व्याख्या -

नचिकेता के पूछने पर यम ने बतलाया कि ब्रह्म जो मनुष्य के कर्त्त्व्याकर्तव्य, कृत्याकृत्य और तीनों काल से पृथक है और जिसका वर्णन समस्त वेद करते हैं और जिसकी प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन किया जाता है, वह ओउम् पद वाच्य है और वही अविनाशी तथा सर्वाधार है और उसी के जानने से मनुष्य उच्च गति प्राप्त किया करता है |

(क्रमशः)