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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपदेश मञ्जरी (3)

******ओउम्******

दूसरा उपदेश

(ईश्वर सिद्धि पर शंका समाधान)

पूर्व संदर्भ http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1395

[मंगलवार 6 जौलाई 1875 * के दिन, श्री 108 दयानन्द सरस्वती जी के ईश्वर-विषयक व्याख्यान पर हुए वाद-विवाद का सारांश]

1. प्रश्न - कार्य और कारण भिन्न भिन्न हैं या और किस प्रकार के ?

उत्तर - कहीं कहीं अभिन्न हैं और कहीं कहीं भिन्न भी हैं | उदाहरण - मृत्तिका से बना घट मृत्तिका ही रहता है, परन्तु मांस-शोणित से नख उत्पन्न होते हैं तथापि मांस और शोणित ये नख नहीं हैं | इसी प्रकार मकड़ी के पेट से जाला उत्पन्न होता है, परन्तु इससे मकड़ी जाला नहीं होती |

गोमयाज्जायते वृश्चिकः |
[अर्थात् - गोबर से बिच्छू उत्पन्न होता है |] तो भी गोबर और बिच्छू क्या कभी एक हो सकते हैं ? सर्वशक्तिमत्त्व चैतन्य में [और] चैतन्य पर सर्वशक्तित्व है अर्थात् सामर्थ्य के योग से चैतन्य निमित्त कारण होता है | इस स्थल पर जड़ पदार्थ जो विश्व का उपादान कारण है वह और निमित्त कारण चैतन्य एक नहीं है | अब -

एकमेवाद्वितीयम् [छा.उ. 6|2|1||]

ऐसी श्रुति है | उसका अर्थ करने में इस उपर्युक्त व्यवस्था से कुछ आपत्ति नहीं आती | कारण, [इसका अर्थ] अद्वितीय अर्थात् ईश्वर ही उपादान हुआ ऐसा नहीं है | कारण भेद तीन प्रकार का होता है | कभी-कभी स्वजातीय भेद रहता है तो कभी-कभी विजातीय और कभी स्वगत भेद होता है | अब 'अद्वितीय है' अर्थात् 'सब जो कुछ है वह ईश्वर ही है' ऐसा अर्थ आधुनिक वेदान्त में लेते हैं | परन्तु यह उपयोगी (= ठीक) नहीं, किन्तु अद्वितीय का अर्थ दूसरा ईश्वर नहीं, अर्थात् एक ही ईश्वर है और वह संयुक्त नहीं है, यही अर्थ है | अब -

ईश्वरः सर्वसृष्टिं प्राविशत् |

ऐसे अर्थ की श्रुति है [.तत्सृष्‍टवातदेवानुप्राविशत् (तै. उ. 2|6)] तो अब इसका अर्थ किस प्रकार करना चाहिए ? अथवा -

सर्व खल्विदं ब्रह्म | [छा.उ. 3|141||]

इस वाक्य का अर्थ कैसे करें ? आधुनिक वेदान्ती 'इदं विश्‍वं' ऐसा मानकर उस शब्द का अन्वय 'सर्व' इसकी ओर करते हैं, परन्तु साहचर्य अर्थात् ग्रन्थ के पिछले अभिप्राय की ओर दृष्टि देने से 'इदं' शब्द का अन्वय 'ब्रह्म' शब्द की ओर करना पड़ता है [जैसे] "इदं सर्वं घृतम्" अर्थात् यह बिलकुल घी है तेल मिश्रित नहीं, ऐसा सर्व शब्द का अर्थ है | ऐसा अर्थ करने से ऊपर के हमारे कहे अनुसार श्रुति का अर्थ होने से [कोई] कठिनाई नहीं रहती |

"नाना वस्तु ब्रह्मणि" अथवा बृहदारण्यकोपनिषद् में 'य आत्मनि तिष्ठन् आ [त्मनोSन्तरो यमा] त्मा न वेद" [शतपथ माध्यन्दिन पाठ 15|6|7|30||] अथवा "यस्य आत्मा शरीरम्" [श. मा. 14|6|7|30||] इस वाक्य के अर्थ के विषय में आपत्ति आयेगी, इसका विचार करना चाहिए | एक ही शरीर के स्थान में व्यापक और व्याप्य इन दोनों धर्मों की योजना नहीं करते बनती | गृह आकाश में स्थित है और आकाश यह व्यापक है गृह व्याप्य है | इसलिए आकाश और गृह ये एक ही हैं वा अभिन्न हैं, ऐसा अनुमान निकालते नहीं आता | इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा ये अभिन्न हैं ऐसा कहने का अवकाश नहीं रहता |

अहं ब्रह्मास्मि | [बृ.उ. 1|4|10||]

इस वाक्य का अर्थ किया जाय तो यह अत्यन्त प्रीति का [द्यौतक] उदाहरण है, यही लौकिक दृष्टान्त पर से स्पष्ट होता है | जैसे 'मेरा मित्र मैं ही हूं' ऐसा कहते हैं, परन्तु मैं और मेरा मित्र, इन दोनों की सर्वथैव अभिन्नता है ऐसा फलितार्थ नहीं होता |

समाधिस्थ होते समय 'तत्वमसि' [छा.उ.6|8,9,10 खण्डों में ] ऐसा मुनि लोग कह गए, परन्तु साहचर्य की ओर ध्यान देने से मुनियों का यह भाषण 'जीवात्मा और परमात्मा अभिन्न है' इस मत का पोषक नहीं होता, क्योंकि इसी वचन के पूर्व भाग में इस सारे स्थूल और सूक्ष्म जगत् में कारण सम्बन्ध से परमात्मा का ऐतदात्म्य [कथित] है | परमात्मा का आत्मा दूसरा नहीं, 'स आत्मा' [छा.उ. 5|8,9,10||] वही आत्मा है 'तदन्तर्यामि त्वमसि' जो सब जगत का आत्मा वह तेरा ही है इसलिए जीवात्मा और परमात्मा इनके बीच परस्पर सेव्य-सेवक, व्याप्य-व्यापक, आधाराधेय ये सम्बन्ध ठीक जमते हैं |

एतरेयोपनिषद् में -

प्रज्ञानं ब्रह्म [ऐ.उ. 5|3||

ऐसा वाक्य है | उसके महावाक्य-विवरण में -

प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म [द्र . मठाम्ना. उप. 4|]

ऐसा विस्तार किया हुआ है, फिर भी परमेश्‍वर ही सृष्‍टि बना,ऐसा अर्थ "तत् सृष्‍टिं प्राविशत्" ** इस वाक्य पर से करने पर कार्य कारण की अभिन्नता होती है | यदि ईश्‍वर ज्ञानी है तो अविद्या माया आदि के आधीन होकर सृष्‍टयुत्पत्ति का कारण हुआ, ऐसा कहने में 'उसको भ्रान्ति हुई' ऐसा प्रतिपादन करना पड़ता है | [जहाँ] देश, काल, वस्तु [का] परिच्छेद है वहाँ भ्रान्ति है यही भ्रान्ति ब्रह्म को हुई यह मानने से ब्रह्म का ज्ञान अनित्य ठहरता है [अतः]यही विचारणीय वार्ता है |

इसी तरहं 'जीव-भावना' भ्रान्ति का परिणाम है | भ्रान्ति दूर होने से जीव ब्रह्म होता है , ऐसी समझ ठीक नहीं, क्योंकि भ्रान्ति परमात्मा में सम्भव नहीं | आधुनिक वेदान्त के अनुसार मुक्ति को स्वीकार करने पर ब्रह्म को अनिर्मोक्ष प्रसंग आता है | और ब्रह्म को यदि एक कहें तो जीव‌ में ब्रह्म के गुण नहीं हैं, जीव को अपरिमित ज्ञान और सामर्थ्य नहीं | यदि हम ब्रह्म बन जावें तो हम जगत् भी रच लेवें | इससे पुनः एक बार ऐसा कहना आवश्यक हुआ कि विश्‍व जड़, ब्रह्म चेतन है और इनका आधाराधेय, सेव्य-सेवक, व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है |

"सुखमस्वाप्सम्" इस अनुभव की योजना करते बनती है, क्योंकि चैतन्य यह नित्य ज्ञानी है | तैत्तिरीयोपनिषद् में आनन्दमय कोश के अवयव वर्णन किए हुए हैं |

सारांश - जीव ब्रह्म नहीं, जगत् ब्रह्म नहीं | इस स्थल पर कार्य कारण भिन्न-भिन्न हैं | यही प्रकार सत्य है, परन्तु अखिल सजीव और निर्जीव पदार्थ ईश्‍वर ने अपने सामर्थ्य से निर्माण किए | वह सामर्थ्य उसी के पास सदा रहता है, इस तात्पर्य से भेद नहीं आता है |

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* आषाड़, शुक्ला 4, वि.स. 1932 | सोमवार को द्वित्तीया-तृत्तिया सम्मिलित थी |
** तुलना करो - 'तत् सृष्‍टवातदेवानुप्राविशत् |' तै. उ. 2|6||

(क्रमशः)