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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Upanishad says: God never assumes body

उपनिषदों में भी ईश्वर को निराकार एवं अजन्मा ही बताया गया है | उदाहरण के रूप में यहाँ मात्र दो ही प्रमाण विचार हेतु प्रस्तुत किये जाते हैं -

वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् | जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यं || (श्वेताश्वरोपनिषद: २.१)

अर्थात वह परमात्मा अजर, अमर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, विभु और नित्य है | ब्रह्मवादी कहते हैं कि वह कभी जन्म नहीं लेता |

दिव्योह्यमूर्त: पुरुष सः बाह्यान्यन्तरो ह्यजः | अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः पर: || (मुंडक उपनिषद्: २.१.२)

अर्थात वह परमेश्वर अमूर्त, अन्दर-बाहर व्यापक, अजन्मा, प्राण रहित, मन रहित, शुद्ध (पूर्ण ज्ञानी - सर्वज्ञ) तथा अत्यंत सूक्ष्म है |

ये उपनिषत्कार ऋषि लोग स्वामी दयानन्द द्वारा प्रवर्तित 'आर्य समाज' के सदस्य नहीं थे । कम से कम उनकी उक्त सत्य बातों को स्वीकार करने में हमारे मूर्तिपूजक मित्रों को संकोच नहीं करना चाहिए । हमारे पूज्य ऋषि लोग कहते हैं कि - ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता, कभी जन्म नहीं लेता, वह सर्वत्र व्यापक है, अमूर्त है - उसे आंखों से देख नहीं सकते, अति सूक्ष्म होने से संपूर्ण जगत् में अर्थात् सभी जीवात्माओं में तथा जड जगत् में सदैव व्यापक रहता है । कितनी सरल बात कही है - हमारे ऋषिओं ने ! आर्य समाज भी ईश्वर के स्वरूप के बारे में बस यही बात कहता है । इस पर सभी को शांत भाव से विचार करने की आवश्यकता है । विशुद्ध एकेश्वरवाद से अखिल मानवता को एक सूत्र में जोडा जा सकता है ।

= भावेश मेरजा

Are bhai ye idol worship tou

Are bhai ye idol worship tou dushta jungali logon ne apni pet puja ke liye banai hai.In logon ko satya se koi lena dena nahin hai.Bholey bhaley log he in logon ki chapet mein aa patein hai.kewal ajyani log hee aa patein hain.kintu samajhadaar log in sab se door rehkar sabhee ko in logon ke pass janein se mana kartein hain.

कुछ हिन्दु

कुछ हिन्दु भाई कहते हैं कि ऋषि दयानन्द का चित्र लगाना भी तो मूर्ती पूजा है | उनसे यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि मानव का शरीर एक मूर्त पदार्थ है तो इसकी मूर्ती तो हो ही सकती है, इसमें किसी को कहां सन्देह है ? हां मूर्ती परमात्मा की नहीं हो सकती क्योंकि परमात्मा है , निराकार, परमात्मा है सर्वव्यापक, परमात्मा है अनन्त | तो कैसे बनाओगे उसकी मूर्ती ?
अब रही बात पूजा की तो पूजा तो हम सब की कर सकते हैं, पर पूजा के तरीके अलग अलग वस्तुओं के लिए अलग अलग होंगे | जैसे माता पिता की पूजा करनी हो तो उनकी सेवा द्वारा करनी होगी, महापुरुषों की पूजा करनी है तो उनके गुणों का गान करना होगा, उन्हें अपनाना होगा | प्राकृतिक देवों की पूजा करनी है तो उनका संरक्षण करना होगा, उनसे लाभ लेने हेतु उनका विध्वंस नही करना होगा अर्थात पर्यावरण का पूरी तरह से संरक्षण करना होगा | अतः इसका बहुत ही उत्तम प्रकार है यज्ञ | यज्ञ के द्वारा पर्यावरण का संरक्षण उत्तम प्रकार से किया जा सकता है, यज्ञ के द्वारा सभी जीव जन्तुओं का भी भला किया जा सकता है |
इसलिए पूजा करने के लिये केवल उत्तम रीति ही अपनानी श्रेष्‍ठ है | केवल माता पिता की मूर्ती बना कर उस पर भोग लगा कर व इसी प्रकार महापुरुषों की मूर्ती व चित्र बना कर उनकी आरती उतारकर, अथवा प्राकृतिक पदार्थों को माथा टेक कर या नमस्कार करके तो हम कोई उत्तम कार्य नही कर सकते | इसे तो अधिक से अधिक एक खानापूर्ती ही कहा जा सकता है | तो क्या अब हम केवल खाना पूर्ति ही करने वाले बन गये हैं ???

परमात्मा की पूजा का तो तरीका ही निराला होना चाहिये | जब हर कणमें ह‌मारी भीतरी आँख उसे देख सकेगी, तभी तो होगी उसकी पूजा, वरना उसकी पूजा का क्या अर्थ होगा ? चक्रवर्त्ती राजा को एक भुनगा सा बनाकर देखना तो कोई सही नहीं है |

आनन्द‌

And Anand Bakshi ji one more

And Anand Bakshi ji one more fact about the picture of Dayanadaji.
Dayanandaji said that nobody should make my idol,nor any picture who will worship that.
So there remains no question of Murtipuja here.
And if those were not the persons which were related to Arya Samaj who said that god never assumes body,then what?Then does it mean that people should leave Murtipuja?
People will leave their Murtipuja when they will have become literated.
So in order to remove Murtipuja completely from Indian Society we should make others literated.

बिलकुल सही

बिलकुल सही कहा आपने | अज्ञान ही सभी कुरीतियों,अन्धविश्‍वासों व उनसे उपजे दुखों की जननी है अतः अन्धेरे की तरंह अज्ञान को दूर करना ही सर्वप्रथम आवश्यक है, इसमें कहीं भी , कोई भी सन्देह नहीं है | सही ज्ञान होगा तो मूर्ति पूजा, व अन्य अन्धविश्‍वास व‌ प्रृकृतिक नियमों से विरुद्ध बातों को मानना आदि दुर्गुणों से हम बच सकेंगे |
धन्यवाद
आनन्द