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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

शक्ति का स्त्रोत प्रक्रृति, आत्मा अथवा परमात्मा

शक्ति का स्त्रोत प्रक्रृति, आत्मा अथवा परमात्मा -वैदिक सत्य पर आधारित एक वैज्ञानिक द्दष्टिकोण‌ ?

क्या मैं ऐसा हूँ , मैं वैसा हूँ
नहीं ! न मैं ऐसा हूँ , न मैं वैसा हूँ
तो फिर कैसा हूँ
मैं शक्ति हूँ जिसका न रूप है ,न रंग
जो प्रक्रृति को गति देता है , उसके विभिन्न रूपों में परिवर्तन करता है |
प्रक्रृति के विभिन्न रूप उसके (शक्ति) के अस्तित्व के कारण ही हैं |
वरना प्रक्रृति में क्या शक्ति है कि वह अपने रूप रंग आदि अवस्था में परिवर्तन ला सके |
परन्तु क्या मैं ही सब परिवर्तनों को करने वाला हूँ ? इस अनन्त ब्रह्माण्ड् में परिवर्तन करने वाला ?
स्पष्ट ही इसका उत्तर 'न' में है |
तो फिर ?
तो फिर क्या ?
सकल ब्रह्माण्ड् को चलाने वाली भी शक्ति है , उसी का नाम है परमात्मा, भगवान |
तो क्या प्रक्रृति अपने आप् ही शक्ति की उत्पादक नहीं है ?
बिलकुल‌ नहीं |
क्या एटामिक एनर्जि , प्रकाश अग्नि शक्ति के रूप नहीं हैं ?
यदि मैं कहूँ नहीं हैँ तो आप शायद‌ इसे स्वीकार नहीं करेंगे |
ये हैं शक्ति द्वारा प्रदत्त‌ गति के विभिन्न रूप |
तो क्या इन्हें शक्ति नहीं कहा जा सकता ?
नहीं | ये शक्ति का प्रदर्शन अवष्य हैं ,जैसे कि सारा संसार उस परमात्मा कि शक्ति का प्रदर्शन है , परन्तु ये द्रव्यों का शक्ति में परिवर्तन नहीं है| द्रव्य की गति में परिवर्तन मात्र है |न तो इसमे द्रव्य की मात्रा में कमीं आत्ती है , न उसकी शक्ति में बढ़ोतरी होती है, बस द्रव्य की गति में , अवस्था में परिवर्तन आता है, वह तितर बितर हो जाता है अथवा कोई अन्य रूप ग्रहण कर लेता है| इसे अन्य कुछ समझना नादानी है, वैज्ञानिक सत्य नहीं है |
देखिये प्रक्रृति का हर कण गति कर रहा है | यह गति अति तीव्र है | पर यह हमें दिखाई नहीं दे रही है | इसलिए लगता है कि इसमें गति नहीं है और इसलिए शक्ति भी नहीं है | जब हम इसकी गति में कुछ इस प्रकार परिवर्तन कर पाते हैं कि उसके रूप रंग, गन्ध, स्पर्ष , शब्द आदि गुणों में परिवर्तन आ जाता है , तो हमें लगता है कि इन पदार्थों से अर्थात प्रक्रृति से शक्ति प्रदान की गई‌ है, ये शक्ति में परिवर्तित हो गये हैं, ( Their energy levels have changed ) परन्तु ऐसा नहीं है | प्रकाष भी प्रक्रृति का एक रूप है, जिसमें गति का क्रम अलग है, शब्द भी प्रक्रृति का एक अन्य रूप है जिसमें प्रक्रृति के कणों की गति का क्रम अलग है, गर्मीं भी प्रक्रृति का एक अन्य रूप है जिसका गतिक्रम अलग है | इसी प्रकार हम देख सकते हैं कि जिस जिस को हम शक्ति मानते हैं वह शक्ति नहीं परन्तु गति परिवर्तन मात्र है | एक प्रकार के कम्पन (oscillations) का दूसरे प्रकार के कंपन मे परिवर्तन ,प्रकाष ,ध्वनि आदि के रूप में प्रगट होने वाला प्रक्रृति का अन्य रूप है , न कि शक्ति का उत्पादन| Kinetic Energy का potential Energy में परिवर्तन क्या है ?
kinetic energy में particles का movement एक प्रकार से है जिसे आँख द्वारा देखा जा सकता है, वही जब रुकावट के कारण अविरुद्ध कर दिया जाता है तो गति में ,गति की अवस्था में परिवर्तन आ जाता है ,वह् गर्मीं के रूप में अनुभव किया जाता है ,अथवा potential energy के नाम से जाना जाता है |
सब गति में परिवर्तन मात्र है , अन्य कुछ नहीं | परमात्मा की शक्ति के द्वारा प्रक्रृति को प्रदान की गई गति में परिवर्तन मात्र , न कि शक्ति का उत्पादन अथवा व्यय होना | एक वस्तु का अग्नि, वायु , प्रकाष अथवा आकाष में परिवर्तन केवल गति परिवर्तन है , और् उस परिवर्तन को नापने की इकाई का नाम हमने शक्ति रख दिया है |
हम कभी कभी कहते हैं कि हममें शक्ति नहीं है ,तो इसका अर्थ क्या है ? स्पष्ट‌ ही जब हम शरीर के किसी अंग में मनचाहा गति परिवर्तन नहीं कर पाते तो कहते हैं कि हम में शक्ति नहीं है और् इसके लिए हम भोजन ग्रहण करते है | भोजन का शरीर में जाना एक व्यवस्था के कारण एक क्रम से गुजरता है, जिससे शरीर के विभिन्न अंगो की गति,आन्तरिक बनावट, कंपन आदि में परिवर्तन आता है और् इसको हम भोजन का शक्ति में परिवर्तन मानते है |एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में परिवर्तन ,एक गतिक्रम से दूसरे गतिक्रम में परिवर्तन है | इसमें मूल प्रक्रृति के कणों की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं आता है , न ही उनकी शक्ति में परिवर्तन आता है | आज की वैज्ञानिक भाषा में जिसे शक्ति का उत्पादन कह‌ते हैं ,वह केवल मात्र मूल प्रक्रृति की व्यवस्था एवम गति में परिवर्तन मात्र है, तथा उसके कारण प्रक्रृति के रूप रंग आदि गुणों में परिवर्तन है | जब हम कहते हैं कि kinetic energy ,pot energy में बदल गई और pot energy ,kinetic energy में बदल गई ,तो हम इसी तथ्य को स्वीकार करते हैं , परन्तु जब वह रूप ,रंग आदि में परिवर्तन के कारण दिखाई, सुनाई आदि देती है तो हम इसे गति परिवर्तन न मानकर शक्ति का release होना मानते हैं |
प्रक्रृति के मूल कणो में प्रदान की गई गति निश्चित है , जब उसे अविरुद्ध् किया जायेगा तो वह् विभिन्न रूप ले लेगी, अथवा यूँ कहें कि विभिन्न रुपों में प्रगट होगी,तथा उसका ग्रहण भी विभिन्न इन्द्रियों के द्वारा होगा स्पर्ष ,शब्द,रूप , रस ,गन्ध के रूप में |
एक प्रकार का गति परिवर्तन प्रक्रृति में दूसरे प्रकार के रूप को जन्म देता है | गर्मी , प्रकाश आदि अन्य पदार्थों से अलाग अवष्य हैं पर यह सब प्रक्रृति के विभिन्न रूप हैं न कि ये तो शक्ति हैं और् बाकी सब प्राक्रृतिक अवयव | हाँ द्रव्य इनमें से किसी भी रूप को पूर्ण अथवा अपूर्ण रूप में ग्रहण कर सकता है |
यदि वैज्ञानिक इसको द्रव्य का शक्ति में परिवर्तन मानते हैं तो ठीक है , पर है यह सब गति परिवर्तन ही | इसमें शक्ति का लोप अथवा प्रगट होना, कम अथवा अधिक होना सम्भव नहीं है |जैसे द्र्व्य का विलोप संभव नहीं , इसी प्रकार् शक्ति का विलोप संभव नहीं | अर्थात् 'Neither matter can be destroyed or created, nor Energy can be created or destroyed.
A revolutionary change can occur if this principal is accepted. We can further conclude :
Neither matter can be converted in to Energy , nor Energy can be converted in to matter .
यदि द्रव्य ही शक्ति भी है तो जब हम भोजन कर लेते हैं तब हमको गति करने लग जाना चाहिए , न कि बैठै रहना चाहिए , परन्तु ऐसा नहीं है |आप शरीर को केवल अपनी इच्छा से जब चाहे प्रयोग में ला सकते हैं |आपकी शक्ति ही इसकी गति में मूल चूल परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है , वरना यह सृष्टि क्रमानुसार एक निश्चित परिवर्तन से गुजरेगी |
यदि हम‌ आत्मा नहीं शरीर हैँ तो एक निश्चित क्रम से इसका विकास अथवा पतन तो संभव है, परन्तु इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार से कर पाना केवल आत्मा कि ही शक्ति का काम है |
आइये अब देखते हैं उपरोक्त सत्य को स्वीकार कर लेने के पश्चात हमें क्या लाभ होंगे, तथा किन नुकसानो से हम बच पाएंगें |
(1) आज का वैज्ञानिक‌ अन्धा धुन्ध इस बात को खोजने पर व्यय कर रहा है कि किस भौतिक द्रव्य के कारण कौन सी क्रिया शरीर में हो रही है | वह सब क्रियाओं का जनक द्रव्य को मानता है ,तथा उसकी तलाश में भटकता फिरता है | अब यदि शक्ति का स्त्रोत द्रव्य न होकर आत्मा व परमात्मा है तो हमें केवल व्यवस्था का अध्ययन करना चाहिए तथा आत्मिक शक्ति का विकास करना चाहिए , न कि द्रव्यों के पीछे भाग दौड़् करनी चाहिए |
(2) यदि द्रव्य में शक्ति ही नहीं है तो इसे हम अपने ऊपर राज ही क्यों करने दें | आत्मा इसकी अधिष्ठाता , इन्द्र बनकर इस पर राज्य क्यों न करे ? अर्थात इस तथ्य को ग्र्हण करने के पश्चात आप इन्द्रियों , शरीर ,मन , बुद्धि को जैसा चाहेंगे प्रयोग में ला सकेंगे | आपका आलस्य ,प्रमाद सब दूर हो जाएगा |
(3) राग द्वेष, लोभ मोह सब, जो पदार्थ को सब कुछ मानने के कारण विद्दमान हैं, लुप्त हो जाएंगे |
(4) एक अदभुत समाज का फिर से निर्माण होगा जो आज के समाज से ठीक विपरीत होगा | जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सभ्य ,इमानदार ,अहिंसक होगा, अर्थात फिर से रामराज्य व आर्यावर्त की स्थापना होगी |
(5) अपने शरीर को हम ठीक से समझ सकेंगें | इसे ठीक से प्रयोग कर सके‍गें | इसे सुबह शाम चार्ज करेंगे , कसरत ,व्यायाम , प्राणायाम द्वारा , ताकि सारा दिन इससे काम लिया जा सके | अभी तो हम बिना छार्ज किये चाहते हैं कि यह शक्ति की जनक स्वयं कार्य करती रहे , बस हमें फल मिल जाये | बहुत कुछ धन दौलत | कितना गलत ध्येय, जो कि अज्ञान का सूचक है |
यह शरीर शक्ति का जनक ही नहीं है तो इससे आषा करना व्यर्थ है | हम शक्ति हैं तो हम शक्ति का प्रयोग क्यों नहीं करते ?

इसी प्रकार अनगिनित लाभों को गिनाया जा सकता है | तो आइये इस सत्य को समझें , जानें और मानें |
आज की स्थिति यह है कि
जो ऊर्जावान है वह अपने को ऊर्जाहीन समझ रहा है, तथा जो कुछ ऊर्जाहीन है उसे ऊर्जावान मान रहा है | गाड़ी बैल को खींच रही है, बैल समर्थहीन हो गया है |