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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महा दिव्य इक नेता

महा दिव्य इक नेता (रचयिता ---श्री चिन्ता मणि वर्मा )

फ़ैल रहा क्या ? फ़ैल चुका था ,भारत में अन्धेरा ।
भारत की जनता भटक रही थी तज अपनापन सारा ।।१ ।।

भूल रही थी , छोड़ रही थी ,वेद-धर्म की महत्ता ।
पाखंडों के बीच फंसी थी जब भारत की जनता ।।२ ।।

विधर्मियों का तो क्या कहना , थे बहकाते फुसलाते ।
नाना भांति कार्य में रत हो , धर्म- भ्रष्ट थे करते ।।३ ।।

ऐसे विकट समय में आया महा दिव्य इक नेता ।
दयानंद का जन्म हुआ , नवयुग चेतना प्रणेता।।४ ।।

शिवरात्रि की रात्रि में वह बना ज्ञान का प्यासा ।
सच्चे शिव की खोज करूँगा हुई एक जिज्ञासा ।।५ ।।

मुझको शिव दर्शन करना है कम से कम इक बार ।
यही सोच करके उसने छोड़ा था निज घरबार ।।६ ।।

जब सिद्धार्थ ने गृह त्यागा था ,तनिक न बाधा आई ।
पर इस बालक के आगे तो थी बाधा की खाई ।।७।।

बाधाओं से जूझ -जूझ कर ही आगे बढ़ पाया ।
सच्चे गुरु की खोज में था , वह दूर -दूर दौड़ा धाया ।।८ ।।

जो भी गुरुजन उसको मिलते , पाखंडी ही मिलते ।
महिमा वे पाखंडों की ही , उसको थे बतलाते ।।९ ।।

इसी भांति वे बहुत दिनों तक , इधर -उधर थे भटके ।
तभी पहुँच पाए वे आश्रम में प्रज्ञा- चक्षु के ।।१० ।।

गुरु विरजानंद से पाई, तब दयानंद ने दीक्षा ।
देशकाल की, जाति धर्म की, वेद ज्ञान की शिक्षा ।।११ ।।

भारत के घर -घर में फैले , फिर से धर्म महान ।
आर्य जाति को फिर से होवे , आर्य धर्म का ज्ञान ।।१२ ।।

विरजानन्द प्रज्ञा चक्षु की यह महान अभिलाषा ।
यह महान व्रत पूर्ण करेगा , थी दयानंद से आशा ।।१३ ।।

दयानंद ने निज जीवन, गुरु दक्षिणा हित‌ दान दिया ।
उनकी हर इच्छा पूरी हो , यह भी गुरु को वचन दिया ।।१४ ।।

विधर्मियों के अभियानों का ,भारत से पाखंडों का ।
नाश करूँगा मैं भारत में फैले इस अंधियारे का ।।१५ ।।

दुनिया भर में अमर वेद का , मैं सन्देश अमर दूंगा ।
चाहे राह कंटीली कितनी ,इस‌ पर चले चलूँगा ।।१६ ।।

दयानंद ने गुरु दक्षिणा दी , यह ही निज गुरु को ।
गुरु दक्षिणा तो क्या उसने, अर्पित किया जीवन को ।।१७ ।।

लिए पताका हाथ धर्म की , पाखंडों के खंडन की ।
चले कुम्भ के मेले में , ले आश धर्म के जय की ।।१८ ।।

गरज -गरज कर पंडों को ,ढोंगी जन और धूर्तों को ।
डांट और फटकार दिया ,जनता को सन्मार्ग दिया ।।१९ ।।

भारत की काया को पलट किया ,पाखंड दुर्ग को हिला दिया ।
विकृत धर्म का नाश किया ,आर्य धर्म का घोष किया ।।२० ।।

हरिद्वार से वे चलकर ,खंडन -मंडन करते डटकर ।
इक बार बात आई मन में ,मैं चलूँ विजय को काशी में ।।२१ ।।

काशी पहुंचे उदघोष किया ,पौराणिक दल का दलन किया ।
है अगर न तुमको धर्म- ज्ञान ,तो क्यों फैलाते हो अज्ञान ? २२ ।।

है यदि धर्म का ज्ञान तुझे ,है धर्म- ज्ञान अभिमान तुझे ।
तो आओ शास्त्रार्थ करें ,वेद- धर्म का मान करें ।।२३ ।।

काशी में शास्त्रार्थ किया ,उचित धर्म का रूप दिया ।
पर दुराग्रही लोगों ने ,पत्थर फेंके उन धूर्तों ने ।। २४ ।।

धर्म- भ्रष्ट करने वाले ,लोगों को बहकाने वाले ।
जितने भी कुविचारी थे ,नहीं कभी सुविचारी थे ।।२५ ।।

निज को कहते जो रक्षक थे ,पर सचमुच में जो भक्षक थे ।
जो आर्य धर्म के बाधक थे ,जो आर्य जाति के नाशक थे ।।२६ ।।

उन्हें चुनौती कठिन दे ,दुष्ट जनों का नाश किया ।
सब को शुभ सन्देश दिया ,आर्य धर्म का ज्ञान दिया ।।२७ ।।

ब्रह्मचर्य व्रत धारी ऋषि ने ,निर्भय बनने का पाठ दिया ।
आर्य जाति की उन्नति के हित , ऋषि ने अद्भुत कार्य किया ।।२८ ।।

स्त्री शिक्षा ,हिंदी भाषा , को अनिवार्य बताते थे ।
स्वतंत्रता का लाभ महर्षि, जनता को समझाते थे ।।२९ ।।

आर्य देश में गो हत्या था आर्यों के ऊपर अभिशाप ।
गो हत्या को बंद करावें , नहीं कभी सह सकते पाप ।।३० ।।

ब्रह्मचर्य व्रत पालें सब ही , पढ़ें वेद को भी सब लोग ।
धर्म और देश का , मिलकर उत्थान करें हम लोग ।।३१ ।।

वेद भाष्य को करके ऋषिवर ने , हर रहस्य को खोल दिया ।
फिर भी हर जन समझ -सुलभ ,सत्यार्थ प्रकाश प्रकाश किया ।।३२ ।।

इसी लोक हितकारी ऋषि को , दुष्टों ने विषपान दिया ।
फिर भी ऋषिवर ने स्वेच्छा से , उनको जीवन दान दिया ।।३३ ।।

अमर ज्योति वह आर्य जाति को , बतलाकर के राह सही ।
दीपावली की सांध्यकाल में ,देह त्याग कर मुक्त हुई ।।३४ ।।

ऋषिवर के हर कार्यों को ही , हमें बढ़ाना है आगे ।
आर्य संस्कृति -धर्म -सभ्यता ,के हित सदा रहें जागे ।।३५ ।।

रचना तिथि : १३फ़रवरी १९७५

श्री

श्री चिन्तामणी वर्मा रचित गीत अति प्रेरक और ऋषि दयानन्द के आदर्शों को जन जन तक
पहुँचाने वाला है जिसे पढ़कर मन गद गद हो गया आनन्द जी आपका अति धन्यवाद |

राजेन्द्र आर्य‌