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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

भारतवर्ष के सारे अनिष्टों का मूल है - मूर्तिपूजा

"मूर्तिपूजा ने भारत के अकल्याण की जो सामग्री एकत्र की है, उसे लेखनी लिखने में असमर्थ है । मूर्तिपूजा ने भारतवासियों का जो अनिष्ट किया है उसे प्रकट करने में हमारी अपूर्ण-विकसित भावप्रकाशक-शक्ति अशक्त है ।

जो धर्म संपूर्ण भाव से आन्तरिक वा आध्यात्मिक था उसे संपूर्ण रूप से बाह्य किसने बनाया ? - मूर्तिपूजा ने ।

कामादि शत्रुओं के दमन और वैराग्य के साधन के बदले तिलक और त्रिपुण्ड्र किसने धारण कराया ? - मूर्तिपूजा ने ।

ईश्वर-भक्ति, ईश्वर-प्रीति, परोपकार और स्वार्थ-त्याग के बदले अंग में गोपीचन्दन का लेपन, मुख में गंगालहरी का उच्चारण, कण्ठ में अनेक प्रकार की मालाओं का धारण किसने सिखाया? - मूर्तिपूजा ने ।

संयम, शुद्धता, चित्त की एकाग्रता आदि के स्थान में त्रिसीमा (धारणा, ध्यान, समाधि) में प्रवेश न कर, केवल दिन-विशेष पर खाद्य-विशेष का सेवन न करना; प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल में अलग-अलग वस्त्रों के पहनने का आयोजन और तिथि-विशेष पर मनुष्य-विशेष का मुख देखना तो दूर रहा उसकी छाया तक का स्पर्श न करना, यह सब किसने सिखाया ? - मूर्तिपूजा ने ।

हिन्दुओं के चित्त से स्वाधीन-चिन्तन की शक्ति किसने हरण की ? - मूर्तिपूजा ने ।

हिन्दुओं के मनोबल, वीर्य, उदारता और सत्साहस को किसने दूर किया ? - मूर्तिपूजा ने ।

प्रेम, संवेदना और परदुःखानुभूति के बदले धोरतम स्वार्थपरता को हिन्दुओं के चरित्र में कौन लाई ? - मूर्तिपूजा ।

हिन्दुओं को अमानुष, अपितु पशुओं से भी अधम किसने बनाया ? - मूर्तिपूजा ने ।

आर्यावर्त के सैकडौं टुकड़े किसने किये ? - मूर्तिपूजा ने ।

आर्य जाति को सैकड़ों सम्प्रदायों में किसने बांटा ? - मूर्तिपूजा ने ।

आर्य जाति को सैकड़ों वर्षों से पराधीनता की लोहमयी शृंखला में किसने जकड़ रक्खा है ? - मूर्तिपूजा ने ।

कौन-सा अनर्थ है जो - मूर्तिपूजा द्वारा सम्पादित नहीं हुआ ?

सच्ची बात तो यह है कि आप चाहे हाईकोर्ट के न्यायाधीश हों, चाहे गवर्नर (लाट) साहब के प्रधानतर सचिव, आप बुद्धि में बृहस्पति के तुल्य हों, चाहे वाग्मिता में सिसरो और गेटे से भी बढ़कर, आप अपने देश में पूजित हों अथवा विदेश में, आपकी ख्याति का डंका बजा हो, आप सरकारी कानून को पढ़कर सब प्रकार से अकार्य और कुकार्य को आश्रय देनेवाले अटर्नी कुल के उज्ज्वल रत्न हों, चाहे मिष्टभाषी, मिथ्योपजीवी सर्वप्रधान, स्मार्त्त (वकील); परन्तु यदि किसी अंश में भी आप मूर्तिपूजा का समर्थन करेंगे, तो हमें यह कहने में अणुमात्र भी संकोच नहीं होगा कि आप किसी भी अंश में भी भारतवर्ष के मित्र नहीं हो सकते, क्योंकि मूर्तिपूजा भारतवर्ष के सारे अनिष्टों का मूल है ।"

[मूल लेखक - पंडित श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, ग्रन्थ - "महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन-चरित", प्रकाशक - गोविन्दराम हासानन्द, २०५० वि० स० प्रथम संस्करण, पृष्ठ २७]

प्रस्तुतकर्ता - भावेश मेरजा

पूजा

पूजा किसलिये करते हैं ? प्राण प्रतिष्‍ठा किसलिये करते हैं ? यह बातें हमें विचारनी चाहिये |
पूजा का उद्देश्य आत्मविकास है अथवा परमात्मा की चमचागिरी ? यदि आत्मविकास है तो यह हमारे प्राणों व विचारों में प्रेरणा भरने वाली होनी चाहिये, उनमें शक्ति का संचार करने वाली होनी चाहिये | अब जिसमें हमें ही प्राणों का संचार करने का नाटक करना पढ़े, वह हमारे प्राणों मे शक्ति कैसे फूँक सकती है ? यदि परमात्मा की चमचागिरी ही उद्देश्य है तो व‌ह कैसा परमात्मा है जो यह सब चाहता है ?

यह एक अधूरी विधि है जो शायद उनसे प्रचारित हुई जो परमात्मा को मानते ही नहीं थे, अतः उनको किसी आलम्बन की आवश्यक्ता पड़ी, जिसे उन्होंने मूर्ति बनाकर पूरा करना चाहा | अब यदि हम परमात्मा को मानते हैं, उसे सर्वव्यापक जानते हैं तो फिर हमें तो ऐसे किसी भी आलम्बन की आवश्यक्‍ता पढ़ती ही नहीं है | इसके विपरीत हम परमात्मा को पल पल हर स्थान में अनुभव करने के लिये ही पूजा अराधना अथवा स्तुति, प्रार्थना, उपासना करते हैं और् नित्य प्रति अपने शरीर, मन बुद्धि को प्राणों से व वेद ज्ञान से भरते हैं | यही है वास्तविक विधि आत्मविकास की , अपने उत्थान की व परमात्मा को पाने की, उसका सानिध्य प्राप्त करने की |

आनन्द‌

आदरणीय

आदरणीय भावेश जी
क्या पूजा की विभिन्न पद्धतियां जो विभिन्न धर्मों में प्रचलित हैं, उनका कोई तुलनात्मक व वैज्ञानिक अध्ययन कहीं पर उपलब्ध है ? इस पर अनुसंधान की भी आवश्यक्ता है कि जो पुजापाठ व्यक्ति करता है , उसको वह किस प्रकार करता है, उसमें कितना समय लगाता है, उसमे उसका क्या उद्देश्य होता है, उससे उसे क्या पाने की आशा रहती है, उसको क्या वह अच्छी प्रकार से कर पाता है और कर पाता है तो उसको उससे किस प्रकार की उपलब्धी होती है, उसका कैसे विकास होता है व उसका बाकी के अपने समाज पर व अन्य समाजों पर क्या क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि इत्यादि ?

इस पर आर्य समाज को तो अवश्य ही बृहत परीक्षण कर उसके परिणाम अवश्य घोषित करने चाहिये | क्या रोजड़् का योगसंस्थान व अन्य संस्थान ऐसी किसी योज‌ना पर विचार कर रहे हैं ? यज्ञ‌ पर तो आवश्य ही अनुसंधान् हो रहे हैं, परन्तु वह केवल उसके भौतिक पक्षों पर ही केन्द्रित नजर आते हैं | यज्ञ की आध्यात्मिक उपलब्धियाँ किस प्रकार से प्राप्त की जा सकती है और वह किस किस प्रकार की हो सकती हैं | जो पूर्व में यज्ञ के नाम पर पाखण्ड प्रचलित हुए व अब भी कहीं न कहीं चल रहे हैं उनसे होने वाली हानिया भी अनुसंधान की अपेक्षा रखती हैं |

मैं आशा करता हूँ कि आप इस पर अपने विचार रखेंगे |

आनन्द‌