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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मूर्तिपूजा - सीधी बात का सीधा उत्तर अपेक्षित है

मूर्तिपूजा - सीधी बात का सीधा उत्तर अपेक्षित है -

“सत्यार्थ प्रकाश" के ११वें समुल्लास में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मूर्तिपूजा-समर्थक लोगों के समक्ष एक सीधी बात प्रस्तुत की है, जो इस प्रकार है -

"आवाहन, प्राणप्रतिष्ठादि पाषाणादि मूर्ति-विषयक वेदों में एक मन्त्र भी नहीं । वैसे 'स्नानं समर्पयामि' इत्यादि वचन भी नहीं है । अर्थात् इतना भी नहीं है कि 'पाषाणादिमूर्तिं रचयित्वा मन्दिरेषु संस्थाप्य गन्धादिभिरर्चयेत्' अर्थात् पाषाण की मूर्ति बना. मन्दिरों में स्थापन कर, चन्दन अक्षतादि से पूजे । ऐसा लेशमात्र भी नहीं ।"

Maharshi Dayananda Saraswati has written in the 11th chapter of his 'Satyarth-Prakash' (The Light of Truth) as under:

“Just as there is not a single verse in the Vedas to sanction invocation of the Deity (= Idol) and vitalization of the idol, likewise there is nothing to indicate that it is right to invoke idols, to bathe them, to install them in temples and apply sandal paste to them.”

So his conclusion is that the idol worship is interdicted in the Veda and the true Vedic Shaastraas.

Therefore, our friends defending and practicing idolatry should quote atlease 2-3 clear evidences from the four Vedas and eleven prime Upanishads in support of the idolatry.

अब हमारे उन मित्रों को जो ऐसा समझ रहे हैं कि बिना मूर्तिपूजा का तो हिन्दू धर्म हो ही नहीं सकता, अकल्पनीय है, उनको हमारा नम्र निवेदन है कि आप लोग वेदों में से अधिक नहीं तो कम से कम २-३ ऐसे मन्त्र कि जिनमें मूर्तिपूजा का स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन किया गया हो ऐसे मन्त्र निकालकर प्रस्तुत करें कि जिससे महर्षि दयानन्द की उक्त बात मिथ्या सिद्ध हो जाय । ऋग्वेदादि चार वेदों में बीस सहस्र से भी अधिक मन्त्र हैं । अगर वेदों में ऐसे मन्त्र नहीं मिलते तो आप उपनिषद् वाक्य या दर्शन-सूत्र भी प्रस्तुत कर सकते हो । क्या आपसे इतना भी नहीं हो सकता कि वेदमंत्रों के या उपनिषद् वाक्यों या दर्शन-सूत्रों के माध्यम से स्वामी दयानन्द की उक्त बात का खण्डन किया जा सके? अन्यथा उनकी बात को स्वीकार कर हमारे धर्म को अवैदिक मूर्तिपूजा से पृथक् करने में, उसे सच्चा वैदिक धर्म बनाने में आर्य समाज का सहयोग करना चाहिए । 'हिन्दुत्व' का आदर्श आर्यत्व – वेदत्व ही हो सकता है । विशुद्ध वैदिक धर्म ही हमारा परम लक्ष्य हो सकता है । श्रद्धा और मेधा (विवेक) का सुभग समन्वय ही हमें श्रेष्ठता की ओर ले जा सकता है । हमें महर्षि दयानन्द या आर्य समाज का कोई अन्ध आग्रह नहीं है । वे गौण हैं - सत्य की अपेक्षा; सत्य ही सर्वोपरि है । अतः सत्य का आग्रह अवश्य है । अतः ठीक से सोचिए और विवेक से काम लेवें । मूर्तिपूजा-खण्डन से उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है । मूर्तिपूजा नहीं रही तो क्या है ? हमारे पास अन्य कई सारे अच्छे और सार्थक विकल्प हैं, जैसेकि वैदिक संध्योपासना, वेदपाठ, वेदगान, वेद-स्वाध्याय, पंचमहायज्ञ, सोलह संस्कार, योगाभ्यास, प्राणायाम, गायत्री आदि मन्त्र और "ओ३म्" आदि का अर्थ और श्रद्धापूर्वक जाप, ईश्वर-प्रणिधान आदि आदि । अतः विचार करने की आवश्यकता है । यही हमारी प्रार्थना है ।

= भावेश मेरजा

आदरणीय

आदरणीय भावेश जी

आपने बहुत सही लिखा है | आप के साथ पत्राचार में जो एक भाई यह लिखते हैं कि यदि मूर्ति पूजा को हटा दिया जाय तो सारे भारत के मन्दिरों में जो हिन्दुओं की उपस्थिती है वह समाप्त हो जायेगी,मन्दिर समाप्त हो जाएँगे, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है | इसके विपरीत यदि सभी मन्दिरों में वेदानुकूल संध्या, यज्ञ, वेदशास्त्रों का पाठ, योग शिक्षा का ज्ञान दिया जाये तो यह भारत स्वर्ग बन जाएगा | फिर से रामराज्य भारत में लौट आयेगा | मूर्ति कला का इसमें कहीं भी विध्वंस नही होगा, बल्कि इसमें और अधिक प्रगति होगी |
भगवान इन पौराणिक भाइयों को सद्‍बुद्धि दे |

भावों के अन्धकूप में घिरे यह लोग भावों की गहराई से आगे बढ़ कर अपने भीतर भगवान के वास्तविक स्वरूप को जो प्यार से भरा है, जो आनन्द से भरा है, जो आकार की सीमाओं से बाहर है तभी जान सकेंगे जब इनके मौलिक सिद्धान्त अर्थात केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी कुछ भी नहीं है , इत्यादि समाप्त नहीं हो जाते | अन्यथा ये इसी तर्क कुतर्क में उलझे भावनाओं के समुद्र में गोते खाते रहेंगे | यह भावनाओं का समुद्र ही तो किसी को उत्तेजित करता है तो किसी को अन्ध श्रद्धा से भर पूरी तरहं से मूक बना देता है | जबकि भावनाओं से पार उस निराकार ब्रह्म को पाकर मनुष्य शान्त चित्त्, गम्भीर, धैर्य्ववान आदि अनेक गुणों से विभूषित हो महान पुरुषों की भाँति अपने जीवन को सफल बना लेता है‌

आनन्द‌

धन्यवाद अत

धन्यवाद
अति सुंदर लेख है .परमात्मा के स्वरुप को वेद भी नहीं जानते किन्तु यज्ञ आदि ,पारलोकिक से लोकिक व्यवहार को अधिक महत्त्व देते हैं .
आज अशिक्षा के कारन आम परिवार का स्वरुप बदल रहा है . अध्यात्म की जगह फिलोसोफी ले रही है योगध्यान की जगह कसरत ले रही है .
आवश्यकता है की कुछ पाखंडियों को छोड़कर मूर्तिपूजा भगवन ज्ञान का एवं ध्यान का उचित साधन है .

आपने बडी

आपने बडी सुन्दर बात कही है मूर्तिपूजा इस देश के लिये खाई के समान है.इस विषय पर‌ मैने भी एक छोटा सा लेख लिखा है जिसे आप‌ http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1615 पर मूर्तिपूजा नाम से डाउनलोड कर‌ सकते है.इतना सुन्दर लिखने के लिये धन्यवाद‌

नमस्ते क्य

नमस्ते
क्या बात है, खाई को लांघना संभव नहीं मूर्तिपूजा रुपी खाई को परमात्मा तक पहुचने के लिए पार तो करना ही पड़ेगा . एक बात और, कि रोजमर्रा की जिंदगी की ऊँचनीच प्रारब्ध को दर्शाती ही नहीं अपितु आगे आने वाले समय में उस परमात्मा को समर्पित होने के लिए प्रेरित करती है .