Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'सत्यनारायण की कथा'

हमारे हिन्दू परिवारों में आजकल 'सत्यनारायण की कथा' कराने का प्रचलन अत्यधिक बढ रहा है । शिक्षित हो या अशिक्षित, धनवान हो या निर्धन - सब लोग 'सत्यनारायण की कथा' अपने घर में या कार्यालय आदि में कराते हैं । इस कथा पढने वाले पंडित जी को कोई यह नहीं पूछता कि - "महाराज ! आप अपनी इस कथा में केवल वही कथा सुनाते हो कि 'सत्यनारायण की कथा' सुनने का क्या फल होता है । मूल कथा क्या थी ? - यह तो आप हमें कभी सुनाते ही नहीं हो ।"

ये कथाकार पंडित लोग कथा कुछ इस प्रकार से सुनाते हैं - "एक व्यापारी था । उसका जहाज डूब गया । वह बरबाद हो गया । अतः दुःखी हो गया और रोने पीटने लगा । किसीने उसको बताया कि - भाई ! तुम 'सत्यनारायण की कथा' सुनो । इसने वैसा ही किया । आश्चर्य यह है कि जब वह 'सत्यनारायण की कथा' सुन रहा था कि उसके पास खबर आई कि - तुम्हारा जहाज डूबा नहीं है । तुम घबराओ नहीं ।

इस प्रकार की कथा का नाम 'सत्यनारायण की कथा' रखा है । यह पत्ता न चला कि मूल कथा क्या थी, जिसके सुनने में सब आपत्तियां दूर हो गईं ? पंडितजी कथा के फल तो बताते हैं, पर उन्हें मूल कथा ही मालूम नहीं है, और न ही किसी को बताते हैं ! हमारे भोले भक्त लोग (श्रद्धालु कहे या अंधश्रद्धालु?) इस कथा को अपार श्रद्धा (?) और विश्वास के साथ सुनते रहते हैं । एक ही वर्ष में न जाने विभिन्न स्थानों पर यही कथा वे कितनी बार सुनते होंगे ! पंडितजी को पूछना नहीं चाहिए कि - "महाराज ! हमें मूल कथा सुनाइये - कथा का फल नहीं ।" हो सकता है कि पंडितजी घबरा जाय और टाल मटोल करने लगे । और अगर यह कथा में सच हो तो भारतीय नौका दल को इस कथा के माध्यम से अपने कई डूबे हुए जहाज आदि को पुनः प्राप्त करने का उद्योग करना चाहिए ।

वास्तव में 'सत्य-नारायण' तो परमात्मा ही का नाम है - सत्य भी और नारायण भी । अतः इस कथा को 'सत्यनारायण की कथा' तब ही कहा जा सकता है जब इसमें परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का और उसका साक्षात्कार करने की बात सुनाई जाय । अन्यथा इसे 'सत्यनारायण की कथा' कैसे कहा जा सकता है? आर्य समाज श्री आनंद स्वामीजी तथा श्री स्वामी विद्यानन्दजी 'विदेह' आदि विद्वानों द्वारा प्रश्नोपनिषद् आदि के आधार पर कई वर्षों पूर्व तैयार की गई वैदिक 'सत्यनारायण की कथा' को हिन्दू समाज में लोकप्रिय कराने के लिए प्रयास कर रहा है, मगर उसमें उसे विशेष सफलता नहीं मिल रही है ।

कथा करने का आयोजन तभी सफल माना जा सकता है जब श्रोताओं को ईश्वर के बारे में ज्ञान मिले । व्यर्थ की कथा सुनने में अपना समय, शक्ति और धन का व्यय नहीं करना चाहिए । हिन्दू समाज के उत्कर्ष की चिन्ता करने वाले और तदर्थ प्रयत्नशील सज्जन लोगों को इस सुधार हेतु कुछ करने की आवश्यकता है ।

= भावेश मेरजा

pranam !! believe me i have

pranam !! believe me i have listened to this katha many times at home, but see my stupidity this question never came to my mind. o god this is the result of dumbing my mind by believing on puranic stories.

its not long that i came in contact os arya philosophy. i am now getting truth and understanding and dumbing my intellect and mind is not the way to attain god.

thanks now i am progressively waiting for next satyanarayan katha , i will surely ask this ques to pundit ji or whosoever in my family does this katha.

koti koti dhanyavad.

aap kripya aisi logical batein post karte raha karein .