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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : ओ3म् ध्वजा

ओ3म् उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव: |
दृशे विश्वाय सूर्यम् || साम 31 ||

अपनानी छटा सुहानी है, तो गोद ओम की पानी है |
यदि गोद ओम की पानी है, तो ओ3म् ध्वजा फहरानी है ||

प्रभु जातवेद ‍ उत्पादक है,
जड चेतन जगत प्रकाशक है,
वह ज्ञान सूर्य जगमग स्वरूप
निज भक्त उच्च उद्धारक है|

यदि प्रगति उच्चता पानी है,तो दिशा उसी की जानी है |
यदि गोद ओ3म् की पानी है, तो ओ3म् ध्वजा फहरानी है||

जहँ कहिं भी जिसने झंका,
इन जगत वस्तुओं को आंका,
हर कहीं झलक उस की पायी
यही बन गयी ओ3म् पताका||

जागी हर वस्तु निशानी है, जिसमें आभा मुस्कानी है |
यदि गोद ओम् की पानी है, तो ओ3म् ध्वजा फहरानी है ||

हर वस्तु देख कर ज्ञान करो,
अनुकूल कर्म कर मान करो,
श्रधा से भक्ति करो उसकी
यह ध्वज प्रतीक प्रतिमान करो

मन भक्ति तरंगें लानी हैं, प्रभु ध्वजा लहर लहरानी है|
यदि गोद ओ3म् की पानी है, तो ओ3म् ध्वजा फहरानी है ||

(साम वन्दना )

क्या बात

क्या बात है ! इसका कोई जवाब नहीं है | वेद गान ने कितना सुस्पष्ट कर दिया इस वेद-मन्त्र में निहित उच्चतम‌ विचारों को

बहुत 2 हृदय से धन्यवाद !

आनन्द‌