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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : बहती वायु तुम्हारी

ओ3म् वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे|
प्र न आयुंषि तारिषत|| साम 184||

यह बहती वायु तुम्हारी है, जो औषधि बनकर आती है|
यह वायु हृदय छू जाती है, सुख शान्ति प्रचुर दे जाती है||

तुमने वातावरण बहाया,
प्राणदायक इसे बनाया,
हमने इसे प्रदूषित करके
स्वयं मरण का रोग लगाया|

अति भोग विलासी होने पर, कब ईश्वर की सुधि आती है|
यह वायु हृदय छू जाती है, सुख शान्ति प्रचुर दे जाती है||

आओ व्यसनों से तर जाओ,
और वासना पर वश लाओ,
यह शिष्ट प्रकृति मत नष्ट करो
पुष्ट वायु से आयु बढ़ाओ|

वैज्ञानिक आविष्कारों से, अब अपनी मति चकराती है|
यह वायु हृदय छू जाती है, सुख शान्ति प्रचुर दे जाती है||

प्रभु का यह पोषक वातायन,
यह करे शान्त जन जन का मन,
मानस विकास अनुशासन से
हर प्राणी पाये नव जीवन|

यह वायु करे जीवन चिरायु, बल प्राणी वायु ही लाती है|
यह वायु हृदय छू जाती है, सुख शान्ति प्रचुर दे जाती है||

उपरोक्त

उपरोक्त गीत का सामवेद मन्त्र:

ओ3म् वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे|
प्र न आयुंषि तारिषत|| साम 184||