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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : परम पुरोहित‌

ओ3म् अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् |
होतारं रत्नधातमम् || साम 605||

विश्व विधाता के चरणों पर जीवन पुष्प चढाउँ,
जिसने यह ब्रह्माण्ड संवारा, उसकी गाथा गाउँ |

व्यापक प्रकाश के नायक, यह जीत वन्दना तेरी|
प्रभु अग्नि पुरोहित नेता, सुन भीत वन्दना मेरी||

पितु ईश्वर का उपदेश प्रथम,
प्रिय पुत्र करें पितु मान सुगम,
यज्ञ कर्म आरम्भ पलों में
आ अग्नि ज्योति ईश्वर अनुपम|

देव स्तुति अग्र गाम्य की, यह गीत अर्चना मेरी|
प्रभु अग्नि पुरोहित नेता, सुन भीत वन्दना मेरी||

तुम परम पुरोहित हितकारक,
कमनीय, यज्ञ के निष्पादक,
इस सृष्टि यज्ञ के तुम कर्ता
ऋतु ऋतु नूतन सुख स्ंपादक|

शिल्प कला संघर्ष मध्य, सुन देव कामना मेरी|
प्रभु अग्नि पुरोहित नेता, सुन भीत वन्दना मेरी||

हर योग क्षेम के तुम होता,
हर रत्न सम्पदा के स्त्रोता,
प्रभु अग्र अनुगमन करती है
यह संतान पिता कि स्तोता|

मेरे पथ दर्शक का नायक, यह गीत याचना मेरी|
प्रभु अग्नि पुरोहित नेता, सुन भीत वन्दना मेरी||

(साम वन्दना)साम 605||

अति सुन्दर

अति सुन्दर ! आएँ इस मन्त्र को जिसे हम अकसर पढ़ते है उसे इस गीत वन्दना द्वारा प्रथम ह्रदय में उतार लें | फिर हमें मन्त्र का सच्चा सुख प्राप्त हो सकेगा |

बहुत 2 धन्यवाद, आचार्य जी इस अति सुन्दर प्रेरणा के लिए |

आनन्द‌