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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सत्य- संकेत‌

ओ3म् तं त्वा समिभ्दिरग्ङिरो घृतेन वर्धयामसि |
बृहच्छोचा यविष्ठ्य: || साम 661 ||

वस्तु वस्तु में व्याप्त अंगिरा, घृत से मैं तुम्हें बढ़ाता हूँ|
घृत समिधा की आहुति देकर, मैं गीत तुम्हारे गाता हूँ ||

यह अग्नि सभी में व्यापक है,
घृत समिधा अग्नि प्रसारक है,
घृत समिधा की इस आहुति से
यह बढ़ता जगत प्रकाशक है |

अङ्गिरा ग्रहण यह आहुति हो, श्रद्धा से तुम्हें चढ़ाता हूँ |
घृत समिधा की आहुति देकर, मैं गीत तुम्हारे गाता हूँ

बस रहे विश्व ब्रह्माण्ड‌ तुम्हीं,
कर रहे सत्य संकेत तुम्हीं,
पहिचान वस्तुओं की होती
देते विश्‍लेष‌ण शक्ति तुम्हीं |

ज्यों ज्यों अर्पित हो घृत समिधा, त्यों त्यों प्रकाश मैं पाता हूँ |
घृत समिधा की आहुति देकर, मैं गीत तुम्हारे गाता हूँ ||

क्या अपनी थी सम्पदा कभी,
वस्तु अंगिरा की ही सभी,
यह उसकी समिधा उसको दी
मिल गयी कृपा प्रभु आज अभी|

यह ज्योति अंगिरा की पाकर, मैं नत मस्तक हो जाता हूँ |
घृत समिधा की आहुति देकर, मैं गीत तुम्हारे गाता हूँ ||

विशय "सत्य

विशय "सत्य संकेत " बिन्दी लगाना भूल गया कृपया शुद्ध कर देना |

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राजेन्द्र आर्य‌

आचार्य

आचार्य राजेन्द्र आर्य जी
नमस्ते
हम बहुत नत्ंम‌स्तक हो आपके लिखे वेद साम गान व अन्य सभी गीतों व कविताओं का भरपूर लाभ उठा रहे हैं | हाँ इतना अवश्य है कि हमारी गति कुछ सुस्त है |

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बहुत 2 धन्यवाद सहित | हमें बहुत आनंद आ रहा है, बस आप यूँ ही हमें आनंद में सरोबार करते रहें |

आनन्द‌

श्रीमान

श्रीमान आनन्द जी, सप्रेम नमस्ते |
आपके सहयोग और सलाह के लिये कोटिश: धन्यवाद |
आशा है इसी प्रकार उत्साहित करते रहेंगे |

भवदीय:

राजेन्द्र आर्य
9041342483