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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : प्रभु-‍‍ भक्ति प्राप्त, फिर क्या अप्राप्त‌

ओ3म् चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने: |
आ प्रा द्दावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च || साम. 629 ||

हे न्यायरूप इन्द्रियातीत,जड़ जंगम अणु अणु का सृष्टा,
द्यावा पृथिवी,अन्तरिक्ष लोक, को पूर्ण करे अदभुत दृष्टा |

प्रभु भक्ति प्राप्त हो जाये, फिर क्या अप्राप्‍त रह जाये |
प्रभु चरण शरण जो आये, वह आत्म सबल बन जाये ||

ब्रह्मस्थ‌ भक्त जो तेरा है,
उन्नति का सफल चित्तेरा है,
श्रेष्ठ आत्म बल अद्‍‍भुत पाये
जिसका जीवन प्रभु प्रेरा है|

प्रभु प्रीती हृदय में आये, तो आत्म शक्ति मिल जाये |
प्रभु चरण शरण जो आये, वह आत्म सबल बन जाये ||

सन्मार्ग आत्म बल दिखलाता,
वही वायु, जल, अग्नि बढ़ाता,
द्यौलोक भूमि या अन्तरिक्ष
सब कहीं वही है पहुँचाता |

उसके सुमित्र बन जायें, तो ज्ञान ज्योतिगत पायें |
प्रभु चरण शरण जो आये, वह आत्म सबल बन जाये ||

प्रभु वर का बल ही तो बल है,
जड़ चेतन सबका संबल है
सूर्य प्रकाशक जगत आत्मा
सब सृजनहार ये अविचल है|

आभास यही हो जाये, तो मिलन सरल हो जाये |
प्रभु चरण शरण जो आये, वही आत्म सबल बन जाये ||