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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : युवा वृद्ध को सह पाते

ओ3म् वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि |
यद्वां रथो विभिष्पतात् || साम १७३० ||

हे शिल्प विद्द इच्छुक तुमको, जब महाज्ञानी उपदेश करे,
तब तुम से निर्मित रथ, खग संग उड़े अन्तरिक्ष में प्रवेश करे |

हो ग‍ई भले यह देह जीर्ण, पर क्षीण न हम होने पाते |
तन वयोवृद्ध हो जाने से, कुछ व्यर्थ नहीं हम हो जाते ||
यह देह गेह तो अस्थायी,
जो आज ग‍ई तो कल आयी,
लेकर विमान शुभ कर्मों का
हमने नभ में दौड़ लगायी |
पक्षी पीछे रह जाते हैं, हम आगे को उड़ते जाते |
तन वयोवृद्ध हो जाने से, कुछ व्यर्थ नहीं हम हो जाते ||
वार्धक्य हीनता नहीं वृद्धि,
अनुभव ग्रहीत है शुध वृद्धि,
भोगे उपदेशों की महिमा
सुन युवा करे समृद्धि सिद्धि |
हों युवा भले अतिशय शिक्षित, व्यवहार वृद्ध ही सिखलाते |
तन वयोवृद्ध हो जाने से, कुछ व्यर्थ नहीं हम हो जाते ||
निश्चय वृद्धों को नमन करो,
सीख ज्ञान कर्म जग रमण करो,
तुम आह वाह उत्साह गुनो
यों युवा जगत को चयन करो |
जो युवा वृद्ध को सह पाते, जीवन में मधुवन मुस्काते |
तन वयोवृद्ध हो जाने से, कुछ व्यर्थ नहीं हम हो जाते ||

( पं. देव नारायण भारद्वाज वेदभक्त रचनाकार साम वन्दना )

पं. देव

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१. स्वामी स्वराज्य संग्रामी
२. प्रवर्तक
३. मुक्तायन
४ यज्ञ अर्चना
५. श्रुतिशाला
६. गीतस्तुति
७. गीताहुति
८. बिन्दु बिन्दु बोध
९. बोध यामिनी
१0 बोध रत्न माला
११ न‍ई किसन‍ई
१२ वसुन्धरा
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१३ अक्षय सत्यनारायण व्रतकथा
१४ जीवन सुख सोपान
१५ सन्ध्यापथ‌