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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : मन्त्रानुकूल जीवन‌

ओ३म् न कि देवा इनीमसि नक्या योपयामसि|
मन्त्रश्रुत्यञ्चरामसि|| साम १७६ ||

श्रुति मन्त्र अर्थ का गान करो |
अनुकूल कर्म मतिमान करो ||
हे देव धरणि विद्वान जनो,
तुम हम पर कृपा निधान बनो,
वेद मन्त्र हम्को सिखलाओ
यह विनय सुनो आह्वान सुनो |
श्रुति सदाचरण गतिमान् करो,
अनुकूल कर्म मतिमान करो |
विद्वान दया दिखलाते हैं,
हिंसा को दूर भगाते हैं,
वे नहीं किसी का हनन करे
जग में प्रसन्न्ता लाते हैं |
अधिग्रहण नहीं अभियान करो |
अनुकूल कर्म मतिमान करो ||
पथ भ्रष्ट नहीं वे करते हैं,
जो पढ़ते हैं वह कहते हैं,
मन्त्रानुसार जीवन् जीते
जो कहते हैं वह करते हैं |

प्रभु हमें मन्त्र बल दान करो |
अनुकूल कर्म मतिमान करो ||

हिंसा न करें, पथभ्रष्ट न हों, बस सत्य वरण ही करते हैं,
ऋत वेद अपितु जो कहता है, हम वही आचरण करते हैं |

ऋग्वेद/साम

ऋग्वेद/सामवेद : मन्त्रश्रुत्यञ्चरामसि : मन्त्रानुकूल जीवन/आचरण

श्रीमान आनन्द जी,
आपका लिखा मन्त्रानुकूल आचरण विषय पर ऋग्वेद १0‍|१३४|७ मन्त्र बहुत ही अच्छा लगा
और मेरा भी मन वैसा ही सामवेद का मन्त्र काव्यानुवाद से आनन्द प्राप्त करने का हुआ
और मन्त्रानुकूल जीवन "साम वन्दना" सामवेद् १७६ लिखा आशा है आप इसका भी अवश्य
आनन्द प्राप्त कर लाभ उठाएंगे |

धन्यवाद आनन्दजी , आनन्दिता सदा भुयासु:
शुभ कामनाएँ

राजेन्द्र आर्य‌

न कि देवा

न कि देवा इनीमसि नक्या योपयामसि|मन्त्रश्रुत्यञ्चरामसि || साम १७६ ||