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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : वृद्ध की मार‌

ओ३म् विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार |
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्दा ममार स ह्य: समान || साम ३२५ ||

अत्यन्त गूढ़ भू- द्दु- लोक, कर्मानुसार ही मिलता है,
क्यों मित्र रूप सप्त इन्द्रियों को, कर भोग लिप्त रिपु बनता है |
यह अद्भुत सृष्टि तुम्हारी है, यह काव्य विचित्र तुम्हारा है |
जो कल तक जीवित जागृत था, वह आज मौत का मारा है ||
युवा कामना अनगिन करते,
वे शत्रु मार कर जय वरते,
ऐसे सन्नद्ध युवाओं को
एक वृद्ध है सहज निगलते |
वह पके केश का वृद्ध काल, उसने सबको संहारा है |
जो कल तक जीवित जागृत था, वह आज मौत का मारा है ||
हो महापुरुष या महा यति,
बलधारी या ऐश्वर्यपती,
रूपवान मृदु वाणी वक्ता
जिन पर रीझी हो सरस्वती |
ये क्षणभर कहीं चूकते तो, चढ़ता बुड्ढे का पारा है |
जो कल तक जीवित जागृत था, वह आज मौत का मारा है ||
हर समय आत्म हो सावधान,
कर्तव्य निभायो विधी विधान,
तुम यहाँ रहो या वहाँ रहो
हर कहीं रहो सत्कीर्तिवान |
आदर्श पुरुष वे धन्य हुए, मरकर भी जन्म संवारा है |
जो कल तक जीवित जागृत था, वह आज मौत का मारा है ||