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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : अन्न भण्डार‌

ओ३म् यवं यवं नो अन्धसा पुष्टं पुष्टं परि स्त्रव |
विश्वा च सोम सौभगा || साम ९७५ ||

यू अन्न श्रेष्ठ अन्नों के साथ, हमें यव भी प्रभूत प्रदान करो,
अत्यन्त पुष्टिकारक जो है, सब सम्पति का विधान करो |

प्रभु अन्नपति का हर दाना, तन पुष्टि, पुष्टि मन वाला हो |
हे अन्न तुम्हारे दानों से, हमने मृदु सोम निकाला हो ||
यव का भोजन उत्तम भोजन,
सात्विकता लाता यह भोजन,
यह शुद्ध शक्ति तन को देता
निर्दोष बनता मन भोजन |
यव रस से सोम सुखद आये, जो तेरा मधुर निबाला हो |
हे अन्न तुम्हारे दनों से, हमने मृदु सोम निकाला हो ||
यह अन्न देह को पुष्ट करे,
यह हृदय हर्ष सम्पुष्ट करे,
उदरपूर्ति कर स्वाद शक्ति दे
जीवन सचेष्ट उत्कृष्ट करे |
साक्षात सोम सम्मान स्त्रोत, उत्साह बढ़ाने वाला हो |
हे अन्न तुम्हारे दानों से, हमने मृदु सोम निकाला हो ||
हो न्याय नियम उपकार जहाँ,
भण्डार तुम्हारा अन्न वहाँ,
सौभाग्य यहाँ आश्रय पाये
सद् कीर्ति पहुँचाती कहाँ कहाँ |
शारीरिक सौष्ठव स्वास्थ्य से, सौभाग्य चमकने वाला हो |
हे अन्न तुम्हारे दानों से, हमने मृदु सोम निकाला हो ||