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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : प्रेरित बुद्धि


ओ३म् त‌त्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि |
धियो यो न: प्रचोदयात् || १४६२ ||

प्रेरित करता मम बुद्धि को, सृष्टिकर्ता सत्कर्मों में,
परमात्मदेव का श्रेष्ठ तेज, हम धारण करें स्वकर्मों में |

तुमने रवि सृष्टि सजाई है, हमको भी तुमने जन्म दिया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

तुम से बढ़कर श्रेष्ठ जगत में,
और कौन है ज्येष्ठ जगत में,
उर अन्तर में तुम्हें बसाया
करके प्रेम यथेष्ट जगत में |

प्रभु वरण दे रहा गुण दर्शन, गुण का हमने आचरण किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

आचरण शुद्धतादायी है,
यह करता तेज मजायी है
तब प्रभु ही प्रभु रह जाते हैं
हट जाती जग परछाई है |

गुण सहित गुणी प्रभु सम्मुख हैं, तब सहज देव का ध्यान किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

प्रभु मिलन हुआ क्या शेष रहा,
दर्शन कर बुद्धि प्रवेश रहा,
धी सदा प्रेरणा पूरित हो
सेवक यह मांग विशेष रहा |

प्रभु गुण संचारित मेधा ने, जग सुख रक्षण संभरण किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

ओ३म्

ओ३म् तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि |
धियो यो न: प्रचोदयात् || साम १४६२ ||

प्राण- प्रदाता संकट- त्राता, हे सुखदाता, तु है ओ३म् |
सविता- माता पिता- वरेण्यं, भगवन- भ्राता, तु है ओ३म् ||
तेरा शुद्ध स्वरूप करें हम, धारण- धाता, तु है ओ३म् |
प्रज्ञा प्रेरित कर सुकर्म में, विश्व- विधाता, तो है ओ३म् ||

RAJENDRA P. ARYA
362-Sunami Gate,
Guru Nanak Pura,
SANGRUR -148001 (Punjab)
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साम वन्दना

साम वन्दना : प्रेरित बुद्धि
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Submitted by Rajendra P.Arya on Fri, 2011-05-27 02:17. साम वन्दना

ओ३म् त‌त्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि |
धियो यो न: प्रचोदयात् || १४६२ ||

प्रेरित करता मम बुद्धि को, सृष्टिकर्ता सत्कर्मों में,
परमात्मदेव का श्रेष्ठ तेज, हम धारण करें स्वकर्मों में |

तुमने रवि सृष्टि सजाई है, हमको भी तुमने जन्म दिया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

तुम से बढ़कर श्रेष्ठ जगत में,
और कौन है ज्येष्ठ जगत में,
उर अन्तर में तुम्हें बसाया
करके प्रेम यथेष्ट जगत में |

प्रभु वरण दे रहा गुण दर्शन, गुण का हमने आचरण किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

आचरण शुद्धतादायी है,
यह करता तेज मजायी है
तब प्रभु ही प्रभु रह जाते हैं
हट जाती जग परछाई है |

गुण सहित गुणी प्रभु सम्मुख हैं, तब सहज देव का ध्यान किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||

प्रभु मिलन हुआ क्या शेष रहा,
दर्शन कर बुद्धि प्रवेश रहा,
धी सदा प्रेरणा पूरित हो
सेवक यह मांग विशेष रहा |

प्रभु गुण संचारित मेधा ने, जग सुख रक्षण संभरण किया |
सद्बुद्धि प्रेरणा हमको दो, प्रभु हमने तुमको वरण किया ||