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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : जगन्नाथ से प्यार‌

ओ३म् अग्निदूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् |
अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् || साम ३ ||

तू पुण्य कर्म मंडित करता, अपराध पाप दण्डित करता ,
हे दाता सर्वज्ञ विधाता शुचि, तू संसार यज्ञ निर्मित करता |

यदि तुम्हें जगत अधिकार चाहिए |
तो जगन्नाथ से प्यार चाहिए ||
प्रभु अग्नि जगत निर्माता है,
वह इसको यज्ञ बनाता है,
धन्य- धन्य वह सुन्दर कर्ता
वह इसमें फूल खिलाता है |

यदि तुम्हें यज्ञ उपकार चाहिए |
तो जगन्नाथ का प्यार चाहे ||

वह देव दूत अद्‍भुत अनूप,
सब ज्ञात उसे जग के स्वरूप,
वह होता सकल प्रदाता है
देता सुधार की वही धूप |

यदि तुम्हें प्रेय- परिवार चाहिए |
तो जगन्नाथ का प्यार चाहिए ||

रथवान छोड़ रथ पर चढ़ता,
रथ सहित रथी भी गिर पड़ता,
जो साथ रथीश्वर के चलता
उसका ही रथ आगे बढ़ता |

यदि तुम्हें श्रेय- श्रंगार चाहिए |
तो जगन्नाथ का प्यार चाहिए ||

ओ३म्

ओ३म् त्वमग्ने गृहपतिस्त्वं होता नो अध्वरे |
त्वं पीता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि च वार्यम् || साम ६१ ||

जो सृष्टि यज्ञ रचना करता है, है वही श्रेष्ठता का स्वामी |
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी ||

इस देह गेह भूमण्डल के,
तुम स्वामी हो जीवन जल के,
हे अग्नि ज्ञान बल तप द्वारा
तुम शिल्पी हो सृष्टि विमल के |

तुम दो सुन्दर परिवेश् हमें, ज्यों अरुणोदय की लालामी |
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी ||

व्यष्टि सृष्टि के यज्ञायोजन,
तुम्हीं आहुतियाँ करते मोचन,
जो जन करते वरण तुम्हारा
तुम कर देते उनका शोधन |

चेतना तुम्हीं से पाते हैं, जग के सब प्राणी सहगामी |
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी ||

दिया तुम्हीं ने सुभग धरातल,
हम सुभग बनायें अन्तस्तल,
जो चयन किया वह ग्रहण‌ किया
किया सम्भरण प्रभु ने पल पल |

बाँह‌ तुन्हारी हमने थामी, तुमने भी भर दी है हामी |
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी ||

साम ||६१ ||

साम ||६१ || मन्त्र
को प्रकोष्ठ में भी दे दिया है |

राजेन्द्र आर्य‌