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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : ज्योतियाँ

ओ३म् इदं त एकं पर उत एकं, तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व | संवेशनस्तन्वे ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे ||साम ६५ ||

प्रभु एक ज्योति, दो ज्योति नहीं, हम तीन ज्योतियों वाले हों |
अपने इस उज्जवल जीवन में, झिलमिल प्रभु के उजियाले हों ||

स्वस्थ देह धन एक ज्योति है,
सर्वत्र लुभाती यही ज्योति है,
भूमि अग्नि जठरग्नि रूप धर
वीर्य कान्ति सौन्दर्य ज्योति है |

शरीर सौष्ठव से ऊपर उठ, हम सुन्दर मानस वाले हों |
अपने इस उज्जवल जीवन में, झिलमिल प्रभु के उजियाले हों ||

मल तज कर देह विमल होता,
द्वेष त्याग मन बनता मोती,
तव अन्तरिक्ष के शशि समान
द्दुति मानस की शोभा होती |

आनन्द मनोहर मन प्रसाद, मन ज्योति जगाने वाले हों |
अपने इस उज्जवल जीवन में, झिलमिल प्रभु के उजियाले हों ||

ज्योति सदन है अभी अधूरी,
मेधा करती जिसको पूरा,
ज्योति तीसरी सूर्य रश्मि की
बुद्धि सृजन बल भरती भूरा |

मनुज त्रिज्योतित देवगणों का सुख स्नेह बढ़ाने वाले हों |
अपने इस उज्जवल जीवन में झिलमिल प्रभु के उजियाले हों ||

अति प्रथम जीव स्थूल शरीरा, क्षण जीना क्या क्षण मरना,
श्रेष्ठ कर्म के अर्थ जीव, संगति प्रभु की प्रतिक्षण करना |