Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : अपना आश्रय‌

ओ३म् स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||साम १८७५ ||

एक नहीं सब देवों का रस अपने जीवन में आया है|
हमें चाहिए नाथ तुम्हारे, सब गुण देवों की छाया है||

इन्द्र बढ़ाये विद्दुत जल को,
वृद्धश्रवा नभ श्रवण कमल को,
पूषा पोषक वायु बहाये
और बृहस्पति ज्ञान अनल को|

अनिष्ट निवारक अरिष्टनेमि शुभ शक्ति अहिंसक लाया है|
हमे चाहिए नाथ तुम्हारे, सब गुण देवों की छाया है||

क्षत्रिय राजा इन्द्र हमारा,
आगे आ उसने हुंकारा,
वैश्य बन गया पूषा पोषक
धन वैभव का दिया सहारा|

प्रिय शुद्र श्रमिक ने सेवा का, सदैव निज हाथ बढ़ाया है|
हमें चाहिए नाथ तुम्हारे सब गुण देवों की छाया है ||

वृद्ध बृहस्पति ब्राहम्ण आया,
सन्मार्ग उसीने दिखलाया,
यों बृहत ब्रहम् के दल बल से
हमने अपना आश्रय पाया|

ब्राहम्ण क्षत्रिय वैश्य शूद्र का, हम को सहचर्य सुहाया है|
हमे चाहिए नाथ तुम्हारे, सब गुण देवों की छाया है ||

सबका पोषक

सबका पोषक है विश्वदेवा:, यशयुक्त हो ईश्वर स्वस्तिमयी,
सम अश्व दे सुख कल्याण करे, प्रभु निश्चय है कल्याणमयी|