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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सोमदेव का मधुर सोम‌

ओ३म् स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धार्या|
इन्द्राय पातवे सुत: ||साम ४६८ ||

हे सुखवर्षक आनन्ददाता, है अखिल विश्व का धारक तू,
दे मानव को प्रभु वेद ज्ञान,स्व शक्ति से जग विस्तारक तू|
***
सोम देव के मधुर सोम ने, कर सृजन जगत को पाला है |
संसार सभी पीने वाला, तू एक पिलाने वाला है||

हे सोम तुम्हारी सरितायें,
सरिताओं की यह धारायें,
कण- कण भूमण्डल में रहकर
सर्व सुखारी वायु बहायें|

इन सोम सृजक धाराओं में, रस सौरभ बहने वाला है|
संसार सभी पीने वाला, तू एक पिलाने वाला है ||

सोम प्राण रस स्वाद भरा है,
मदकारी आह्लाद भरा है,
पतन नहीं पावनता देता
निर्विवाद सम्वाद भरा है|

सोम नाथ कि ज्ञान भक्ति से, खुलता कर्मों का ताला है|
संसार सभी पीने वाला, तू एक पिलाने वाला है||

वह इन्द्र सोम देने वाला,
यह इन्द्र सोम लेने वाला,
मनुज- मनुज में यही उपज कर
बिखरता आनन्द निराला|

संयम सौजन्य श्रेष्ठता का, रक्षक यह सोम शिवाला है|
संसार सभी पीने वाला, तू एक पिलाने वाला है ||