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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : ज्येष्ठ- श्रेष्ठ अनुपम यथेष्ठ‌

ओ३म् प्रेष्ठं यो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्|
अग्ने रथं न वेद्दम् || ५ ||

तुम ज्येष्ठ श्रेष्ठ‌ अनुपम यथेष्ठ, हम तो साधारण प्राणी हैं|
हमको अपनालो हे प्रभुवर, हम दास नहीं अभिमानी हैं ||

तुम हो विराट बहु ठाठ बाट,
है दमक रहा रवि से ललाट,
सर्वत्र तुम्हारा ही प्रकाश
कण- कण संसृति वन- नगर- घाट|

सम्बन्ध अतिथि सा जोड़ प्रभो, तुम से परिचय की ठानी है|
हमको अपनालो हे प्रभुवर, हम दास नहीं अभिमानी हैं||

स्तवन किया प्रिय अतिथि बनाया,
महमान तुल्य दर्शन पाया,
तुमसे इतना अपनत्व हुआ
अपना प्यारा मित्र बनाया|

अपने रथ पर हमें बिठाकर, यह यात्रा सफल बनानी है|
हमको अपनालो हे प्रभुवर, हम दास नहीं अभिमानी हैं||

पैदल को प्रभु रथ मिल जाये,
स्वयं सारथी बन प्रभु आये,
प्रिय अतिथि मान्य गुणग्राहक हो
उसकी मधु मैत्री को पाये|

हर दिशा- दशा पथ और पृथा, रथ यात्री बनता ज्ञानी है|
हमको अपनालो हे प्रभुवर, हम दास नहीं अभिमानी हैं ||

तू काल रहित, सीमा विहीन, तू ईश मुमुक्षु पिपासा है,
तू मित्र रूप और रवि स्वरूप, मम प्रज्ञा की जिज्ञासा है |