Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : श्रेष्ठता का स्वामी

ओ३म् त्वमग्ने गृहपतिस्त्वं होता नो अध्वरे|
त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि च वार्यम्||साम ६१||

जो सृष्टि यज्ञ रचना करता है, है वही श्रेष्ठता का स्वामी|
निज जीवन् धन्य बना लेता, इस स्वामि का हर अनुगामी||

इस देह गेह भूमण्डल के,
तुम स्वामी हो जीवन जल के,
हे अग्नि ज्ञान बल तप द्वारा
तुम शिल्पी हो सृष्टि विमल के|

तुम दो सुन्दर परिवेश हमें, ज्यों अरुणोदय की लालामी|
निज जीवन् धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी||

व्यष्टि सृष्टि के यज्ञायोजन,
तुम्हीं आहुतियाँ करते मोचन,
जो जन करते वरण तुम्हारा
तुम कर देते उनका शोधन|

चेतना तुम्हीं से पाते हैं, जग के सब प्राणी सहगामी|
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी||

दिया तुम्हीं ने सुभग धरातल,
हम सुभग बनायें अन्तस्तल,
जो चयन किया वह ग्रहण किया
किया सम्भरण प्रभु ने पल पल|

बाँह तुम्हारी हमने थामी, तुमने भी भर दी है हामी|
निज जीवन धन्य बना लेता, इस स्वामी का हर अनुगामी||
*****************************************
हे वरण योग्य ब्रह्माण्ड देव ।संसार यज्ञ का होता तू,
तू अति पुनीत ज्ञानी महान, उत्तम धन ज्ञान प्रदाता तू|

Rajendra P.Arya