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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : समर्पण की भाषा

ओ३म् भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा राति: सुभग भद्रो अध्वर:|
भद्रा उत प्रशस्तय ||साम १११||

चारों आश्रम क्रम से आयें, इनमें मानवता की आशा|
कल्याण इसी में मानव का, ले सीख समर्पण की भाषा||

जन्म क्षणों से बाल्य काल तक,
कब तुझ में है सामर्थ्य अधिक,
रहता माता की गोदी में
दे शरण चिता आगे शिक्षक|

सेवा श्रम से ज्ञान ग्रहण कर विकसित हो जीवन परिभाषा|
कल्याण इसी में मानव का, ले सीख समर्पण की भाषा||

बालक ने पाई तरुणाई,
सुखी गृहस्थी नयी बसायी,
धन समाहार धन वितरण से
जग में उसने कीर्ती कमायी|

दान धर्म से सद्गृहस्थ की, सौभाग्य पूर्ण हो प्रत्याशा|
कल्याण इसी में मानव का, ले सीख समर्पण की भाषा||

घर के दायित्व निर्वहन कर,
बना वनस्थी यज्ञ रचाकर,
कल्याण हेतु प्रस्थान किया
चौथे बन सन्यास ग्रहण कर|

समर्पण दान यज्ञ प्रबुस्तुति, सौभाग्यक्रमिक यह अभिलाषा|
कल्याण इसी में मानव का, ले सीख समर्पण की भाषा ||
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राजेन्द्र आर्य‌