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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सुरूप रक्षा

सुरूपकृलुमूतये सुदुधामिव गोदुहे|
जुहूमसि द्दवि द्दवि ||साम १६० ||

हम प्रतिदिन तुम्हें पुकार रहे, प्रभु आ जाओ, प्रिय आ जाओ|
ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ||

यह रूप सरूप किया तुमने,
आकर्ष अनूप दिया तुमने,
सुकुमार कली सी कोमलता
रस रंग स्वरूप दिया तुमने|

ललचाये खड़े लुटेरे हैं, प्रभु इनसे हमें बचा जाओ|
ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ||

अति उत्तम दुग्धदायिनी गौ,
पय सहज दुहाती अपना गौ,
वह दुहने वाला गोपालक
संरक्षित रखता अपनी गौ||

प्रभुवर हम गाय तुम्हारी हैं, तुम गोपालक बनकर आओ|
ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ||

सुन्दर शरीर आकर्षक हो,
यह हृदय स्नेह सुख वर्षक हो,
न्याय नियम सम्पन्न बुद्धि से,
यह रूप शान्ति का वर्धक हो|

यह रूप सुरूप सुरक्षित हो, हे नाथ सूत्र वह बतलाओ|
ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ||

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गोपय दुहने वाले के लिए गौ के सम सुन्दर रूपों को,
निर्मित करता जो प्रभु उसको, हम नमन करें शुचि रूपों को||