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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : सदा वृद्ध का प्यार‌

ओ३म् कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा|

कया शचिष्ठया वृता ||साम १६९ ||

प्रभु सदावृद्ध बन जायें सखा, तव अपना सुख संसार खिले|
हम वयोवृद्ध के सखा बनें, तो सदावृद्ध का प्यार मिले ||

सदा बृहत प्रभु हमें बढ़ाते,
सुख और सुरक्षा प्रभु लाते,
अति अद्‍भुत प्रभु सदावृद्ध है
सृष्टि पूर्व से चलते आते|

वे स्वयं न घटते बढ़ते हैं, जग को देते विस्तार भले|
हम वयोवृद्ध के सखा बनें, तो सदावृद्ध का प्यार मिले||

निज पितर भले कृशकाय हुए,
पर अनुभव बुद्धि उपाय लिये,
उनके सुखमय अनुशासन से,
जग मार्ग मध्य जल जायें दिए|

कुल कुशल वही सुख संकुल हों, कुल दीपक में सत्कार बले|
हम वयोवृद्ध के सखा बनें, तो सदावृद्ध का प्यार मिले||

वृद्धों से मेल मिलाप रहे,
तो हटता हर संताप रहे,
हो जगत वृद्ध या सदावृद्ध
जीवन रक्षित निष्पाप रहे|

प्रभु सदावृद्ध दो शक्ति हमें, नित प्रीति नीति परिवार पले|
हम वयोवृद्ध के सखा बनें, तो सदा वृद्ध का प्यार मिले ||

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तू सदा वृद्धिदाता अद्‍भुत, सुखमय ज्ञान दे हितकारी,

तू बुद्धियुक्त मम मित्र बने, रक्षक जग का अति सुखकारी |