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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : साथ प्रचेता के

ओ३म् यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा|
न कि: स दभ्यते जन: ||साम १८५ ||

जो साथ प्रचेता के रहता, वह नहीं किसी से दबता है|
चेतना प्रचेता से पाकर, अनुकूल आचरण करता है||

वरुण, मित्र परमेश अर्यमा,
यह उसकी है शुभ गुण गरिमा,
प्रभु- सद्‍गुण के परिपालन से
मानव् को मिलती है महिमा|

तुम श्रेष्ठ सर्व प्रिय हो जाओ, सारा समाज जय करता है|
चेतना प्रचेता से पाकर, अनुकूल आचरण करता है||

श्रेष्ठता हमें सब मिल पाती,
सहृदय मित्रता जब आती,
सब के साथ न्याय करने से
श्रद्धा समाज की मिल जाती|

सब सबके प्यारे, मित्र रहें, कब किसको फिर भय रहता है|
चेतना प्रचेता से पाकर, अनुकूल आचरण करता है||

अब हमको रहना सावधान,
व्यक्तित्व न हो कुछ हासवान,
हम वरण मित्र अर्यमा बनें
तो खिले सुरक्षा का विहान|

वह जैसा है हम वैसे हों, तन वही सुरक्षा करता है|
चेतना प्रचेता से पाकर, अनुकूल आचरण करता है||
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जिसके हो हितैषी रक्षक अति, परमेश्वर राजा और ज्ञानी,
उसे हानि नहीं पहुँचा सकता, कोई तमस् दुष्ट या अज्ञानी|