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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम वन्दना : समन्वय‌

ओ३म् श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत् |
वसूनि जातो जनियान्योजसा प्रति भागं न दीधिम् ||साम २६७ ||

समतुल्य सूर्य श्रमशील बनो, तर बतर स्वेद से हो जाओ|
जितनी तन भूख तुम्हारी हो, मिल बाँट प्रेम से तुम खाओ||

जितनी तन में शक्ति समाई,
श्रम में उतनी शक्ति लगाई,
शक्ति युक्ति निर्माण किये हैं
क्रियाहीनता पास न आई|

मिलकर के ही सब काम करो,एक साथ सब मिल कर खाओ|
जितनी तन भूख तुम्हारी हो, मिल बाँट प्रेम से तुम खाओ||

यह अन्न इन्द्र सब तेरा है,
श्रम से ही बनता मेरा है,
धन धान्य सफलता उस दिन
करता श्रम स्वाद घनेरा है|

सूर्य तप्त हो जल बरसाये, तुम वैसे श्रम स्वेद बहाओ |
जितनी तन भूख तुम्हारी हो, मिल बाँट प्रेम से तुम खाओ||

जिसमें जितनी आग चाहिए,
उसको उतना भाग चाहिए,
वात्सल्य भाव से हो विभाग
पर हित में कुछ त्याग चाहिए|

यही समन्वय साम्यवाद है, आदर्श यही तुम अपनाओ |
जितनी तन भूख तुम्हारी हो, मिल बाँट प्रेम से तुम खाओ||
*****************************
न प्राप्त करे वह ज्ञान जीव, जो विमुख हो जगत नियन्ता से,
करे विजित तुरंग तुरंग को ही, रवि निशिदिन जोड़ेअनंता से |

ऋषि ऋण को

ऋषि ऋण को चुकाना है आर्य राष्ट्र बनाना है
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो बढ़ने का जमाना है
देश के कोने-कोने में सन्देश सुनाना है

हम कसकर कमर चले हैं, निकले हैं
इस मार्ग में ले मजबूत इरादा...
हम कभी न विचलित होंगे, ना होंगें
परवाह नहीं चाहे आये कितनी बाधा
हमारा वेद खजाना है, जो सबसे पुराना है

असमानता की ये खाई, हाँ खाई
अब पाटनी है समाज की आंगन से
मजहब की ये दीवारें, हाँ दीवारें
नहीं राखनी है माता के दामन में
पाखंड गढ़ ढाना है दलितों को उठाना है

सूरज की किरण से तपकर, हाँ तपकर
जब निकलेगा मेहनत का पसीना
सोना उगलेगी ये धरती, हाँ धरती
खुशहाली हो दूध दही का पीना
खेतों में कमाना है उद्योग लगाना है

आपस के झगडे सारे, हाँ सारे
पंचायत में अपने आप निपटाओ
इस दहेज के चक्कर से , टक्कर से
यह विनती करे समाज को बचाओ
मंहगे को जमाना है ना लुटना-लुटाना हैऔर आगे देखें

ऋषि ऋण को

ऋषि ऋण को चुकाना है आर्य राष्ट्र बनाना है
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो बढ़ने का जमाना है
देश के कोने-कोने में सन्देश सुनाना है

हम कसकर कमर चले हैं, निकले हैं
इस मार्ग में ले मजबूत इरादा...
हम कभी न विचलित होंगे, ना होंगें
परवाह नहीं चाहे आये कितनी बाधा
हमारा वेद खजाना है, जो सबसे पुराना है

असमानता की ये खाई, हाँ खाई
अब पाटनी है समाज की आंगन से
मजहब की ये दीवारें, हाँ दीवारें
नहीं राखनी है माता के दामन में
पाखंड गढ़ ढाना है दलितों को उठाना है

सूरज की किरण से तपकर, हाँ तपकर
जब निकलेगा मेहनत का पसीना
सोना उगलेगी ये धरती, हाँ धरती
खुशहाली हो दूध दही का पीना
खेतों में कमाना है उद्योग लगाना है

आपस के झगडे सारे, हाँ सारे
पंचायत में अपने आप निपटाओ
इस दहेज के चक्कर से , टक्कर से
यह विनती करे समाज को बचाओ
मंहगे को जमाना है ना लुटना-लुटाना हैऔर आगे देखें

ऋषि ऋण को

ऋषि ऋण को चुकाना है आर्य राष्ट्र बनाना है
तो मिल के बढ़ो मंजिल पे चढ़ो बढ़ने का जमाना है
देश के कोने-कोने में सन्देश सुनाना है

हम कसकर कमर चले हैं, निकले हैं
इस मार्ग में ले मजबूत इरादा...
हम कभी न विचलित होंगे, ना होंगें
परवाह नहीं चाहे आये कितनी बाधा
हमारा वेद खजाना है, जो सबसे पुराना है

असमानता की ये खाई, हाँ खाई
अब पाटनी है समाज की आंगन से
मजहब की ये दीवारें, हाँ दीवारें
नहीं राखनी है माता के दामन में
पाखंड गढ़ ढाना है दलितों को उठाना है

सूरज की किरण से तपकर, हाँ तपकर
जब निकलेगा मेहनत का पसीना
सोना उगलेगी ये धरती, हाँ धरती
खुशहाली हो दूध दही का पीना
खेतों में कमाना है उद्योग लगाना है

आपस के झगडे सारे, हाँ सारे
पंचायत में अपने आप निपटाओ
इस दहेज के चक्कर से , टक्कर से
यह विनती करे समाज को बचाओ
मंहगे को जमाना है ना लुटना-लुटाना हैऔर आगे देखें